#Pratiyogita Kavita by Ishq Sharma Pyar se

विरही  मेघ

तड़प ज़मी की, प्यास ज़मी की।

आस ज़मी की, कौन बुझाये।

चीर-चीर के बादलों को।

घिर घिर के बादलों संग।

“विरही मेघ” तू जल्द आजाये।

“विरही मेघ” तू जल्द आजाये।

बदली बनकर बादल सारे।

आते रहते, जाते रहते।

रफ़्तार इनकी घोड़ो सी।

बचपन से घुड़पुछ कहलाते।

कभी ना थकते, चलते ख़ूब।

दिनवा-रतिया, साँझ-सकारे।

कहाँ रुकी तू, कहाँ हैं ठहरी।

क्यूँ बन बैठी मेरी बैरी।

बरस जा उमड़-घुमड़ के तू।

कान खोल के सुन ले भैरी (बहरी)।

विरह से तेरी प्रसन्न होगा।

धरती आँगन हर तन-मन।

गिरेगा लहू सा आँसू, जो धरा पर।

उपजेगा हर वन में धन।

किस राग में, किस धुन में, कौन जाने तू कहाँ जायें।

“हे! विरही मेघ, तू जल्द आजाये”

“हे! विरही मेघ, तू जल्द आजाये”

इश्क़ शर्मा प्यार से

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