Pratiyogita Kavita by Kapil Kurbe

बारिस

चमकती बिजली

गरजते बादल

टर्राते मेंढक

टीप टीप करती

वर्षा की बूंदे

बहती पवन

बहता पानी

बहते बादल

नव स्नान की हुई

नव पुष्प पत्तियां

रूके हुए पानी पर

नव बूंदो के पड़ने पर

नव भंवरों का बनना

निरंतर…

आसमान पर

सतरंगी ईंद्रधनुष

(जो अभी आधा ही बना है)

आनंदित करता है

उन्मादित करता है…

पर…

भीगा सा मौसम

भीगी सी हवाएं

भीगी सी मिट्टी

भीगे भीगे पंछी

भीगा सा आलम

भीगी सी यादें

(जो अभी तक धुंधली थी)

उसे वर्षित जल

धुल देता हो जैसे…..

याद दिलाता है , तुम्हारी

निरंतर…

सारी भीगी यादें

इसी मौसम में मिलकर

बिछड़ने तक की

फिर भले ही

रूक जाए यह बारिस…

आंखो की बारिस

बरसते रहती है

बिना गरजें

बिना चमकें

निरंतर…….

कपिल कुर्वे

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9 thoughts on “Pratiyogita Kavita by Kapil Kurbe

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