Pratiyogita Kavita by Manglesh Jaiswal

फूलों की डोर पर सजनी बैठी इठलायें,
मंद-मंद बयार से तन सिंहर सिंहर जायें ।

मन बेकाबू लगी पिया से मिलन की आस,
कोयल की कूक से वेदना बढ़ती ही जायें।

मनभावन सावन बैरी हुआ री सखी आज,
ललाट से बूंद पानी की नितर नितर जायें ।

हिया में भ्रमर सिहरन सी पैदा करे आज,
मन हिचकोले लेकर बिखर बिखर जायें ।

चुनरी उडी़ उडी़ जाय सावन की बयार में,
अंग अंग “मंगलेश” चित चितर चितर जायें ।

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164 thoughts on “Pratiyogita Kavita by Manglesh Jaiswal

    1. वाह सर जी वाह , कमाल की रचना हैं। अन्तर आत्मा तक भाव विभोर कर दिया ।

  1. बहुत सुंदर सर जी
    इस कविता सावन का बहुत सुंदर वर्णन प्रस्तुत किया गया है

  2. काव्य पंक्तियां लय ताल में होकर भावना प्रधान भी हैं, सुंदर रचना, मंगलेश जी

  3. सजनी के मन में प्रकृति को देखकर उपजे प्रेम का बहुत सुंदर शब्दो में वर्णन।

    1. इंसान तब समझदार नहीं होता जब वो बड़ी बड़ी बातें करने लगे, बल्कि समझदार तब होता है जब वो छोटी छोटी बातें समझने लगे l.

  4. श्रृंगार रस का अदभुत् चित्रण प्रकति प्रेम भी परलक्छित हो रहा है अति सुन्दर रचना ।

  5. आनुप्रास अलंकार का अनुपम उदाहरण , सावन में वर्षा का सौन्दर्य दर्शन,वाह

  6. अद्भुत ,अनुपम ,सावन में बारिश की बूंद का नायिका के ललाट से गिरना मन को मोह लेता है डाक्टर साहब।

  7. बहुत सुन्दर रचना है डॉ मंगलेश जी जायसवाल

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