#Pratiyogita Kavita by Poetess Kumar Smriti

सावन..कविता
सब ढूंढते हैं, सावन को साधन में,
पायल में, बिछिया में, चूड़ी में, कंगना में,
हाथों की मेंहदी में,
मैं, ढूंढती हूँ सावन को आँगन में।

उस आँगन में
जहाँ इक इक बून्द को
तरसती है धरती
पैरों की बिबाइयों सी लिए दरारें।

मैं ढूंढती हूँ, सावन को
खेतों में, बालू की रेतों में
रिमझिम जहाँ फुहारें
पौधों को हरियाली दें।

मैं ढूंढती हूँ, सावन को,उन चौराहों पर
जहाँ सरेआम नग्न की जाती है नारी
और अट्हास में दब जाती हैं सिसकियाँ
कि उठकर कोई तो ढँक ले।

मैं ढूंढती हूँ सावन को
उन आँचल में जहाँ दम
तोड़ देती हैं हड्डियाँ भी मेहनत से
फिर भी दो जून रोटी को तरसते हैं नन्हें।

मैं ढूंढती हूँ सावन को उन आँखों में
जहाँ टपक पड़ते हैं दो बून्द शबनम
जब कभी दिल को ढेंस लगती है
और लब पर उभर आती है, मुस्कुराहटें।।
Poetess kumari smriti.

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