#Pratiyogita Kavita By Pratik Palor

बरसात

मुझ पर हुई झमाझम बारिश, हर बादल से भीगा हूँ..हर एक मौसम बून्दें सारी, अन्दर तक मैं भीगा हूँ..

मन कठोर था मेरा पहले, ऊसर बंजर बिन पानी..बड़े जोर की चली हवाएँ, मेघ श्याम दल मनमानी..

पहले की थोड़ी-सी रिमझिम, घटाटोप फिर हुई सघन..छुपने को ना ठौर मिली तो, भीगने में ही हुआ मगन..

साँवले थे कुछ साँवरे-से, कुछ थे बड़े भयानक भी..कुछ आँखों में पहले से थे, आए कुछ अचानक ही..

कुछ लाए थे अमृत भर के, कुछ जल के कुछ विष के भी..क्या भरना क्या बह जाने दूँ, निर्णय मुझ पर इसके भी..

कभी-कभी कुछ बड़े क्रोध में, घोर गर्जना करते हैं..उफानों-तूफ़ानों से, मर्यादा तोड़ा करते हैं..

हो जाएगा शान्त सभी बस, कोलाहल है कुछ पल का, होता ही रहता परीक्षण, साहस का औ सम्बल का..

अंकुर जो हैं भीतर छुप के, बैठे हैं चुपचाप कहीं..अब आया है अवसर उनके, उग आने का आज यहीं..

कुछ बादल थे शिक्षा जल के, हरा-हरा मन भरा किया..कुछ थे भक्ति वाले रोपित, हृदय प्रभु आसरा दिया..

कुछ रचना की पौध बढ़ेगी, लहराएगी कला फ़सल..कुछ सपनों की बेल फलेगी, अपनी-अपनी नई नसल..

गुणों की कुछ है घास उगी, तो अवगुण की भी खरपतवार..घास आत्मा का चारा है, दूजा साफ़ करूँ हर बार..

वर्षा जल हो कितना पावन, मेरी मिट्टी में मिल कर..कुछ तो कीच बनेगा ही पर, दिल ना घबरा बोझिल कर..

पनपेंगे कीड़े व्यसनों के, बीमारी के कीटाणु..शरण पड़ूँगा गुरू ज्ञान की, निपटारा मैं ना जानूँ..

धूप सुहानी फिर आएगी, सूखेगा सब अनचाहा..ताल-तलैया नदी घाटियाँ, महकेंगे चमकेंआहा!!

याद रहे बस अज्ञानों के, बन्द पिटारे पड़ा रहा..देखे ना जो रोशनी, भर बदबू-सीलन सड़ा रहा..

भावनाओं के दरख़्त सारे, धुल जाते लगते नये..इसीलिये सावन भादो पर, गीत कितने कहे गए..

छोटी-छोटी काग़ज़ की भी, नाव बालमन चलती है..हिचकोले भी खाती हैवो, ख़ुद ही आप सम्भलती है..

मन के आसमान के कोने, चाप चढ़ा है रंगीला..तिरछी नज़रें देखे साजन, चञ्चल भी है शर्मीला..

बयार चलती है शीतल तो, मन मयूर-सा झूमे है..गोरी की आँखों में हरदम, प्रियतम प्रतिमा घूमे है..

बारिश ही तो याद दिलाती, बचपन यौवन काल की..भुला ही देती उम्र हमारी, चाहे जितने साल की..

उमंग, इच्छा, भोजन देती, देती है सारे जज़्बात..कितनी जीवन से पूरी है, जीवन जैसी ये बरसात..

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