#Pratiyogita Kavita by Ram Chandar Azad

वर्षा ऋतु
मेघ ढक्यो जब भानु को, धूप गई खिसियाय |
लाख चाहकर  भी नहीं, जमीं पर पहुँची भाय |
जमीं पर पहुँची भाय, नहीं  वह बहुत गुसाई |
मेघ की उसने जमकर किन्ही ,बहुत  खिंचाई |
कहता  है ‘आजाद’ धूप  की  बंध गई  घेंघ |
चारिहु ओर से आ जब  उसको  ढक्यो  मेघ ||1||
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बरसा  आवत  देखकर  दादुर करैं  पुकार |
टर्र टर्र  की गूंज  को रही  बिखेर  बयार |
रही बिखेर बयार  सुगंध  की लंबी  चादर |
जिसे देख गगन में  मस्त भयो  है बादर |
कहता है ‘आज़ाद’ तपन से हर कोई हरसा |
भयो किसान मगन देखिकर  आवत बरसा ||२||
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जल  की  बूंदन  पायकर  धरा  रही  हरसाय |
तृण तृण कण कण खिल उठे जलबूंदन को पाय |
जलबूंदन को  पाय धरा  की  छवि भई न्यारी |
मनो हरित  परिधान  पहिन  आई  कोई नारी |
कहता है ‘आजाद’ दिखत  चहुँदिश जल ही जल |
जैसे  दर्पण  सम  फैली  हो  बूंदन  की  जल ||३||
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