#Pratiyogita Kavita by Rashmi Badwar Namdev

सावन है प्रिय बादल छाये

लेकिन अब तक तुम न आये।

झूले में जब सखियां झूली

प्रियतम मैं तो तुममें भूली।

घनघोर घटा यादों की छायी

मेरे मन को ये तड़पायी,

प्रेम स्मृति में ही खोयी मैं,

तुमसे इस सावन ना मिल पायी

सावन है प्रिय बादल छाये

लेकिन अब तक तुम न आये

बागों मे सुन्दर फूल लुभाते

पंछी उड़ते भंवरे भी गाते।

खेतों में हरीतिमा है  छाती

पर इस तन को है झुलसाती।

क्या राह बने मिलन की बोलो

कुछ तो मन के भेदों को खोलो।

सावन है प्रिय बादल छाये,

लेकिन अब तक तुम न आये।

बारिश में मन है गीला सा कुछ,

तुम बिन है अकेला सा तुच्छ

आ कर इसको अनमोल बनाओ

छू लो मुझ को ,स्वर्ण बनाओ।

प्यास नहीं घटती इस मन की,

अब तो कुछ उपचार बनाओ।

सावन है प्रिय बादल छाये

लेकिन अब तक तुम न आये।

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