Pratiyogita Kavita by Shabnam Sharma

वर्षा ऋतु

छिप गया सूरज, बदरी छाई,

टप-टप पानी, मन हरशाई,

जंगल में था मयूर वो नाचा,

कूक-कूक कर कोयल गाई,

सूखे बीज थे खेत से झाँके,

वर्षा ने थी प्यास बुझाई,

रामू काका गुड़कें हुक्का,

छबिया से थी पकौड़ी बनवाई,

दूर शहर से, लाबो रानी,

समेट रही थी अपना छप्पर,

ढूंढ-ढांढ कर उसने थी, आज

छत पर पन्नी फैलाई

वर्षा आई, ठंडक लाई,

कई जगह थी बाढ़ वो लाई।

मिली खबर थी पूर्ण देश को,

घनघोर बदरिया सरहद पर आई,

आँखों से हुई खून की बारिश,

जब घर बेटे की लाश थी आई,

सब कुछ झूठा, कम लगता था,

भारत माँ फूट-फूट कर गाई

‘‘तेरा कर्ज़ अदा करूँ मैं कैसे

मेरी आन की खातिर तूने

अपनी जान गंवाई।’’

कफ़न में लिपटे बेटे बोले,

‘‘माँ पोंछ दे आँसू, फैला ले बाँहें,

छिपा ले हमें अपने आँचल में,

सदा मैं रहने तेरे संग आया।’’

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