#Pratiyogita Kavita by Sudhanshu Upadhyay

कितने ख़्वाबों का बोझ लिए ,हर साल ये सावन आता है,
टूटे तारे ,कसमों ,वादों से , शायद इसका भी नाता है।

कुछ फसलों ने सोचा है ,उनके मालिक की किस्मत बहुरेंगी,
चाहे कितना तूफ़ां आये,वो धरती से न उखड़ेंगी,
मूल ब्याज सब चुकता होगा ,हर बेटी की शादी होगी,
कोई बच्चा भूखा  न सोयेगा ,हर चूल्हे पर रोटी होगी,
गर कम बारिश हो तो ये सारा अरमान धरा रह जाता है,
कितने ख़्वाबों का बोझ लिये हर साल ये सावन आता है।।

आने वाली बरसात में ,सड़कों पर जब,पानी भर जाएगा,
तो चुन्नू उसमे अपनी ,कागज़ की नाव चलाएगा,
पम्मी गुड्डू छोटी चंदन , मिलजुलकर सब खेलेंगे,
मम्मी मुझको डाँटेगी तो दादा दादी से बोलेंगे,
पर सूखे में ,चुन्नू के आँखों से सावन बह जाता है ,
कितनें ख़्वाबों का बोझ लिए हर साल ये सावन आता है।

कुछ कलियाँ भ्रमरों से डट कर ,लोहा लेने वाली हैं,
अपने यौवन का स्वाद उन्हें यूँ ही  न देने वाली हैं,
आतुर यौवन और बारिश का संगम भी न्यारा होता है,
संगीत गीत कविताओं के उद्गम का इशारा होता है,
सबके सुख की कामना लिए इक बंजारा गीत सुनाता है,
कितनें ख्वाबों का बोझ लिए हर साल ये सावन आता है।।

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104 thoughts on “#Pratiyogita Kavita by Sudhanshu Upadhyay

  1. बहुत हृदय स्पर्शी चित्रण शब्दों के माध्यम से ।

  2. Dear Sudhanshu upadhyay …

    Apki kavita bahut badhiy hai… Your poem is excellent

    Very emotional and touching poem

    Regards

    Jugal Pandy

  3. हर चूल्हे पर रोटी होगी। बहुत अच्छी रचना सुधान्शु सर। बधाई हो

  4. अति सुन्दर कविता, यथार्थ चित्रण सावन अरमनो का ही होता है…

  5. कितने ख्वाबों…….एक मर्मस्पर्शी अहसास….Keep it up…god bless….

  6. आपकी हर कविता दिल क़ी गहरियो को छु जाती है………इस बार भी ऐसा हि हुआ

  7. बहुत खूब सूरत कविता आप के द्वारा लिखी गयी है । डॉ. शुद्धांशु उपाध्याय जी

  8. क्या खूब लिखा है, हर एक शब्द एकदम सटीक जगह बैठाया है। कमाल का लिखते हैं आप

  9. अच्छा प्रयास। कविता बाँधती है। कुछ शब्दों की कंजूसी बरतें और प्रभावशाली हो उठेगी। इस कविता का सामाजिक सरोकार मुझे अच्छा लगा। जियो सुधांशु खूब लिखो

  10. कितने ख्वाबों का बोझ लिए हर साल ये सावन आता है। निश्चित ही कविता मर्म को छू गई और हृदय-वीणा के तार झंकृत कर गई। भावनारूपी भिन्न-भिन्न सुवासित पुष्पों से गुंथी माला सरीखी रचना है।

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