#Pratiyogita Kavita by Geetkar Kanhaiya lal Snehi

रावण तो मर गया,हजारों वर्ष पहले ही.
पुतला उसका फिर,बार बार क्यों जलाते हो।
उसी की बुराईयों को हृदय मे बसाकर तुम,
अत्याचार उसके बार बार क्यौं गिनाते हो।
माना रावण दुष्ट था,सीता का हरण किया,
सम्मान उनका रक्खा,तुम ये क्यों भूल जाते हो,
गुपचुप लाज हर रहे हैं,जो सीताओं की,
ऐसे रावणों को फिर भी शीश तुम नवाते हो।
लूट,रिश्वत,भृष्टाचार,जिनका,ध्येय वन चुका है,
कैसे राम,रावणों मे भेद कर पाओगे,
धर्म के नाम पर जो कर रहे हैं,पाप यहाँ,
कैसे उनसे सीताओं,की लाज तुम बचाओगे।
भृष्टाचार रुपी,सभी रावण ज़िन्दा है यहाँ,
फिर भी आज तुम,विजयादशमी मनाओगे।

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