#Pratiyogita Kavita by Gheesaram Dheratwal

विजयादशमी को दोहराया जाय

मान नहीं रहा है औरत का
पौरुष पुरुष का क्षीण रहा
हर हाथ में हथियार देखो
जीवन सांसो से छीन रहा
डूबे है कर्ज में घरबार कई
अन्नदाता भी अब दीन रहा
बचपन में बसे है राम भले
कचरा सड़कों पे बीन रहा
सियासत बनी है जो लंका
शासक रावणसा हीन रहा
चिंता है सब को अपनी ही
सब अपनों में ही लीन रहे

कि परचम ॐ का फहराया जाय
विजय दशमी को दोहराया जाय।।

मर्यादाएं लांघी रही है देहरी
संस्कारों का घोर पतन रहा
दुष्कर्मों की सब नब्ज थामी
सद्कर्मों का यहाँ गबन रहा
चरित निर्माणों को सब भूले
मूल्य विध्वंस का चलन रहा
झूठों की चल रही मनमानी
सच का सच में है दमन रहा
चोर लूटेरों से सजी रजधानी
नेक साहूकारों का गमन रहा
कहे कवि प्रथम प्रेम कहानी
नेपथ्य में है निज वतन रहा

भार माटी से ऐसे उतराया जाय
विजयदशमी को दोहराया जाय।।

इज्जत नारी की हर राह लुटे
जान मासूमों की यूँ जा रही
संवेदना जिन मुदों में है नहीं
गीत सियासत उनके गा रही
नेता लगे है फ़क़त बयानों में
लाशें तिरंगों में नित आ रही
झगड़े है घरघर के जगजानी
दरारें दीवारों को है खा रही
भाव अपनापन के तजे रिश्ते
जुर्म इंसा पे हर सिम्त ढा रही
कहे मानव दास्ताँ ये दिल की
चेतो दुनिया है किधर जा रही

इससे पहले कि घाव गहराया जाय
कि विजयदशमी को दोहराया जाय।।

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