pratiyogita Kavita by Jalaram Jajbati

ग़ज़ल
बरसों से भरमाया इन्साँ देखो क्या क्या करता है,
पुतले के जल जाने से क्या मन का रावण मरता है।

खाली हाथ यहाँ पर आया खाली हाथों जायेगा,
लेकिन मन माया का लोभी रोज़ तिजोरी भरता है।

चार कदम हम आगे आयें चार कदम तू आगे आ,
तेरा है कश्मीर अगर तो लेने से क्यूँ डरता है।

हर पल तेरी याद सताये स्याह अँधेरी रातों में,
सच पूछो तो दिल का पंछी जीता है ना मरता है।

तुझमें मुझमें फ़र्क यही है मैं थोड़ा ‘जज़्बाती’ हूँ,
अक्सर तेरी कुछ बातों से आँख से झरना झरता है।

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