#Pratiyogita Kavita by Kanchan Kritika

आज का रावण

धर्म संस्कार और मर्यादा
त्याग चैन से सोता हूँ
मातु तुल्य पावन धरा पर
खौफ के बीजों को बोता हूँ
चरीत्रहीन अलंकरण का
नित ही उच्चारण हूँ
हाँ, मैं ही आज का रावण हूँ

अत्याचार ही सबसे बड़ा
हथियार मेरा
अज्ञानता के अंधकार से
परिपूर्ण है संसार मेरा
प्राणियों में अंधविश्वास की
ज्वाला दहकाता हूँ
न्याय के गर्दन पर मै
आरा चलाता हूँ
खिलती कलियों को नोचना
धर्म है मेरा
गऊ और कन्या को सताना
कर्म है मेरा
जिसकी कोई उपमा नहीँ,
ऐसा एक उदाहरण हूँ
हाँ, मै ही आज का रावण हूँ

मानवता और संस्कृति का
संहारक हूँ मै
भस्म कर दे जो यश को
ऐसा कारक हूँ मै
हर प्रकार दुर्गुणों व्यसनों
में आसक्त हूँ
जिनका ठेका है गुनाहों का
मै उन्ही का भक्त हूँ
एकता और सहिष्णुता से
मेरा न कोई नाता है
राग-द्वेष और बैर-भाव को
बस फैलाना आता है
उपज रही हर इक अशांति
का मै कारण हूँ
हाँ, मै ही आज का रावण हूँ

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5 thoughts on “#Pratiyogita Kavita by Kanchan Kritika

  • September 4, 2017 at 2:58 pm
    Permalink

    बहुत उम्दा
    आज की वास्तविकता का दर्पण

  • October 3, 2017 at 5:46 am
    Permalink

    बहुत बहुत सुंदर लिखा है आपने

  • October 9, 2017 at 4:51 pm
    Permalink

    mere samjh se kavita vhi rachit kr skta jo kalpna ke sagar me kho sakta h nd nayi soch aati rhe vaisa mai feel kiya hu kanchan ke andar h…so proud of u beautiful lady…

  • October 20, 2017 at 4:52 pm
    Permalink

    बेहद खूबसूरत पंक्तियाँ….. वाह
    उम्दा सृजन|

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