#Pratiyogita Kavita by Kavi Sharad Ajmera Vakil

हर साल रावण जला अपने घर रवाना हो गए.

एक रावण इधर जला वहां हजार पैदा हो गए..

 

वो कहाँ रूकता उसका दम वहां घुटता बहुत है.

दस सर थे दस रूप धर कर फिर पैदा हो गए..

 

इधर हम धर्म की मदिरा पी कर मस्त हुए.

उधर वो बाबाओं का रूप धर प्रकट हो गए..

 

रूप धरा नया काम कहाँ तीरो तलवारों का.

मधुर मुस्कान से ही लाखों की जान के लाले हो गए..

 

था उस वक्त निति अनीति का ध्यान रखा उनने.

कलयुग में तो बिलकुल खुल्ले सांड हो गए..

 

भले ही अहंकार वासना थी पर मर्यादा संयम था बड़ा.

आज के रावण तो अमर्यादित सफेद पोश हो गए..

 

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