#Pratiyogita Kavita by Mag Ram

बात नही ये सतयुग कलयुग, द्वापर की या त्रेता की
सत्य यही हम बात करें अब, भारत पुण्य प्रणेता की
रावण केवल नाम नही है, लंका के सत्ताधारी का
अब प्रतीक वो बन बैठा है, जन जन की लाचारी का
अगर बिलखते बच्चों पर भी, हमको तरस नही आता
और भूख के क्रंदन पर भी, अंतस बरस नही जाता
अगर कोख मे बेटी कोई, अब भी मारी जाती हो
या दहेज़ की चौखट तक, बहुओं की अर्थी जाती हो
धरतीपुत्र किसानों ने भी, अपनी लाश बिछाई है
गिरते गिरते मानवता अब, कहो कहाँ तक आई है
रखवाले जब भक्षक हों तो, सत्ता का आभास कहाँ है
अपनत्व हीन हो अपनापन तो, उसपर फिर विश्वास कहाँ है
मात-पिता या गुरुजन की भी, हँसी उड़ाई जाती हो
जाति धर्म की आड़ लिए नित, लाश बिछाई जाती हो
कैसी है ये राम की लीला, कैसी ये रामायण है
कैसा रावण मार रहे हैं, कैसा धर्म परायण है
रावण कोई व्यक्ति नही है, जिसको आग लगा दोगे
अलादीन का दीप नही है, जिसको आज जगा दोगे
नेह स्नेह को राम बनाओ, आदर्शों की सीता हो
ममता करुणा और दया ही, पावन पुण्य पुनीता हो
संस्कार से आदर्शों का, जब सागर भर जाएगा
वर्तमान का उसदिन निश्चित, रावण खुद मर जाएगा

🌹मगसमः3074/2016

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