#Pratiyogita Kavita By Pankaj Sharm Jhalawar

 एक राम का आना बाकि है
अनगिनत ही पुतले जला दिये,
अनगिनत दशानन बाकि है।
“मैं” भस्म कर चुका दुष्ट-दलन
इस “मैं” को जलाना बाकि है।
इस “मैं” ने कितने विकार जने,
क्रोध,कपट, व्याभिचार जने।
इस”मैं”ने जन्मे कई व्यसन
ये व्यसन मिटाना बाकि है।
मैंने ये बगीचा सींचा है,
मेरा कद क्यों उससे नीचा है?
ये प्रश्न डाह का सबब बने
ये डाह जलाना बाकि है।
नन्हें कदमों की उंगली थामे,
जिसके साये मैं चल पाया।
जिसके कांधे पर चढकर के
दुनिया का दर्शन कर पाया।
उनके जिम्मे सब खत्म हुए..
ये अहसास कराना बाकि है।
गर मोती जो गिरे है पलकों पर..
उन्हें हार बनाना बाकि है।
वो इश्वर सम, मुझे इंसां बन
वो कर्ज चुकाना बाकि है।
गर बड़े बनो तो ..राम बनो
ये चलन चलाना बाकि है।
भरत,सुदामा फिर मिल जाए…
पर लक्ष्मण का आना बाकि है।
कितने पर्दों में कुंठाएं,
कितनी भारी तन्हाई है।
आक्रोश भरे इस दलदल में,
बोझिल होती तरुणाई है।
बोझिल होती तरूणाई में
अभी जोश का लाना बाकि है।
चेहरो पर चढाए बैठे है,
वो नकाब उठाना बाकि है।
दसो दिशाएं बैठे हैं..
अनगिनत दशानन बाकि है।
हर बरस मारते हैं रावण..
पर राम कभी भी आए नहीं..
हर चेहरे में कुछ रावण हैं..
बस राम का आना बाकि है।

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