#Pratiyogita Kavita by Rahul Garg

काम;क्रोध;मोह का स्वरूप आज का रावण
कितने जिंदगियां खा गया ये ब्याज का रावण

साल दर साल वादे की लंबी लिस्ट तैयार करता
जीतकर फिर जाग जाता है सत्ता राज का रावण

चैन होता था हर छोटी सी खुशी मैं आदम को
वो सब कुछ भुलवा गया लालच साज का रावण

करे लूटपाट हत्याएं ये हर वक़्त हर मोड़ पर
ये चारों तरफ फैला हुआ बिना ताज का रावण

प्यार को समझता पाप दुष्कर्मो पर चुप रहता
ये कैसा विचित्र है न जाने समाज का रावण

जरा गौर से उड़ना इसकी बनाई दुनिया मे पंछी
नुकसान पहुँचाने मे लगा रहता आज का रावण

~राहुल गर्ग

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9 thoughts on “#Pratiyogita Kavita by Rahul Garg

  • September 26, 2017 at 4:46 pm
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    बेहद उम्दा सुनकर अद्भत आनंद की लहर दौड़ गयी।

  • September 26, 2017 at 5:00 pm
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    It’s a really good piece buddy.

  • September 26, 2017 at 5:03 pm
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    बहुत सुंदर रचना है वाह

  • September 26, 2017 at 5:10 pm
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    Supb rahul…..it’s a best creativity

  • September 26, 2017 at 5:29 pm
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    मज़ा आ गया इसे पढ़कर भैया

  • September 26, 2017 at 6:49 pm
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    beautiful lines rahul garg

  • September 27, 2017 at 1:57 am
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    Bhut sundar…keep it up

  • September 27, 2017 at 6:49 am
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    Good…
    Keep it up. ☺️☺️☺️

  • September 27, 2017 at 3:04 pm
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    Beautiful lines

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