Pratiyogita Kavita By Rajan Mishra

आज का रावण:
अशतो माँ सद्गमय का हो रहा है साज़,

तमसो माँ ज्योतिर्गमय पर हो रहा है नाज़ ,

जल रहा रावण, दसहरा चल रहा है आज,

जल रहा रावण, दसहरा चल रहा है आज ??
भीड़ से इक बाण अग्नि को समेटे आ रहा,

देखकर उसको दशानन किन्तु ना घबरा रहा,

मुण्ड कट कर गिर रहे थे रुण्ड से होकर विलग,

पर असुर कुछ और ही विकराल होता जा रहा !!
नाभि कुण्ड हो चला शून्य जाने वाली थी जान,

पर रावण के चेहरे पर थी इक विजयी मुस्कान,

मैं बड़ा अचंभित हुआ देखकर, पूँछ लिया आगे बढ़कर,

अब क्यू अट्टहास करता है अब कैसा अभिमान ?

चंद पलों में ओझल होगा निकल रहे है प्रान ??
रावण बोला ऐ अदने कवि जाओ करो विश्राम,

मैं न मरूंगा इस कलयुग में यहाँ नहीं है राम ,

भीड़ को इंगित करके बोला – मेरा ही कुनबा है,

मैं ही खड़ा हुँ इन सब में भी बदल के अपना नाम !!
मेरे दस आनन  दृश्यमान थे, सो तुमने पहचान लिया,

बीस भुजाएं महाकाय थे, तुमने रावन नाम दिया,

अब बड़ा कठिन होगा कविवर, मैंने भी आदम रूप लिया,

अंदर वही अँधेरा है, बस बाहर बाहर धुप किया !!

पहले दस चेहरे थे, अब तो एक में दस रखता हुँ,

बीस भुजाये भी अदृश्य कर मानव सा दिखता हुँ,

ये रावण दहने आये है जो पहन राम परिधान,

मैं इनमे भी जिन्दा हुँ बस इसी लिए अभिमान,
केवल धनुष पकड़ लेने से कोई न होता राम,

मर्यादा पुरुषोत्तम जैसे होने चईये काम !!!

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