#Pratiyogita Kavita by Kavi Sanjeev Tyagi

छोटी छोटी कन्याओं का शीलभंग हो जाता है,
और हमारी व्यवस्था पर रावण हंसता जाता है।

मासूम निवाले बन जाते हैं दानव के आहार में,
खुली छूट है व्यवस्था को लिप्त है भ्रष्टाचार में।

वहशी अब इंसान बना है कैसा कलयुग आया है,
ना रिश्ते नातों की परिभाषा, आंखों में नारी काया है।

भौतिकता के अन्धे युग में हमने खंजर बांटे हैं,
संस्कृति का दीप दान कर, कीकर मंजर कांटे हैं।

रोज मना लो विजयदशमी और रोज जलाओ रावण को,
है विनती बस आज जला दो, अपने अन्तस रावण को।

…….. कवि संजीव त्यागी

नाम……..    संजीव त्यागी
पता……..    701/2 मंगलपांडे नगर
मेरठ (यू पी)
मोबाइल 8445652927

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