#Pratiyogita Kavita by Shanti Swaroop Mishra

अब हर युग में रावण मिलता है !
अब घर घर में रावण मिलता है !
इंसां छोड़ छाड़ ईमान का पथ,
अब हर रोज़ कुपथ पर चलता है !
हर युग में ——————
उस रावण में कुछ शर्म हया थी !
उसमें आदर,ममता और दया थी !
बहुत गिर गया आज का रावण,
यह तो मात पिता को छलता है !
हर युग में———————–
अब बदल गया रावण का नाम !
कहीं रामरहीम कहीं आसा राम !
उस रावण को जाओ अब भूल,
अब तो ऐसों का शासन चलता है !
हर युग में————————-
हम हर साल जलाते उस रावण को !
हम हर रोज़ कोसते उस रावण को !
हम ऐसों को क्यों नहीं करते ख़ाक,
आखिर इनका कैसे धंधा चलता है !
हर युग में ————————
तबतो रावण था बस एक अकेला !
अपनी करनी का फल उसने झेला !
अब तो मिलते हैं अगणित रावण ,
इनको अभयदान क्यों मिलता है !
हर युग में————————–
इन असुरों का नहीं कोई ईमान धर्म !
नहीं मिलेगी आँखों में कुछ हया शर्म !
जो चाहें कर सकते हैं ये इच्छाचारी,
यारो क्यों ना इन पर चाबुक चलता है !
हर युग में————————–

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6 thoughts on “#Pratiyogita Kavita by Shanti Swaroop Mishra

  • September 5, 2017 at 9:33 am
    Permalink

    सही लिखा हर इंसान के अंदर एक रावण छुपा है

  • September 8, 2017 at 8:32 am
    Permalink

    अति सुन्दर वर्णन

  • September 8, 2017 at 8:40 am
    Permalink

    very nicely explained “the aaj ka rawan”

  • September 13, 2017 at 7:52 am
    Permalink

    Waah, Beautiful lines on the subject.

  • September 13, 2017 at 7:57 am
    Permalink

    Waah, beautiful lines on the subject

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