#Pratiyogita Kavita By Surendra Sharma Satyam

सीते!
कुछ लोग धन से भव्य होते हैं व्यवहार से नहीं होते हैं
कुछ लोग व्यवहार से भव्य होते हैं धन से नहीं होते हैं
मैं भव्य हूं धन से, मन से, व्यवहार से, चरित्र से, ज्ञान से, पराक्रम से

सीते!
राम से कहो की वह जब मुझसे युद्ध करने आये तो

किसी स्कूल के आगे से होकर आए
शायद उसे कोई राक्षस मिले और
किसी बच्चे की जान बच जाए।

सीते !
मैं राम के नाम से पाप नहीं करता
मैने अपनी बहन के अपमान का बदला लाया है
मैं ललकार कर सरेआम अपराध करता हूं फिर भी मैं भव्य हूं

और भव्य रहूंगा क्योंकि मैं व्यभिचारी नहीं हूं।

सीते!
मैं आज भी सीमा रेखा नहीं लाघता।
राम से कहो कि वह अपनी खुद की गली, नगर और राज्य मे आज के

राक्षसों और रावणों को छोड़कर अब मुझसे मैदान में आग से न खेले ।

सीते!
अहं यद्यपि रावण: तथापि भव्यम्

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