#Pratiyogita Kavita by Tej Vir Singh Tej

पाप बढ़ा भूमी पर भारी, मचा हुआ था हाहाकार।
विष्णु-रूप धर हुए अवतरित, मनुरूप श्रीराम अवतार।।
चौदह कला सहित अवतारे, मेटन हेतु भूमि का भार।
नाश किया असुरों का रण में, मिटा धरा से अत्याचार।।
अश्विन शुक्ल-पक्ष तिथि दशमी, विजयादशमी का त्यौहार।
राम विजय रावण पर पाए, सुर नर मुनि कीन्हा सत्कार।।
माँ दुर्गा नवरात्रि-दिवस दस, महिषासुर दीन्ही ललकार।
सत्य-सनातन विजयि हुआ है, भई असत् की भारी हार।।
दसवीं तिथि मानहुँ दशहोरा, सुलभ महूरत शुभ का सार।
नव-विद्या प्रारम्भ शुभाशुभ, यहि बेला करिहौ व्यापार।।
निज भुजबल जो रक्षा करते, वे छत्री पूजौ हथियार।
शक्ति-पूजा पर्व अनौखा, हर्षोल्लास भरा व्यवहार।।
हिन्द-धरा संस्कृति का पोषक, पर्व सदा शुचि सम उपहार।
सद्प्रेरक है पर्व दशहरा, झाड़-बुहारौ निज घर-द्वार।।
राम अवधपुर वापस लौटे, दीप जला कर मंगलचार।
वीर-प्रसूता हिन्द धरा के, सन्तति पर अनगिन उपकार।।
करो वन्दना दुर्गे माँ की, रघुपति जीवन-प्राण अधार।
सर्वसिद्धि शुभ तेज प्रदायी, विजयादशमी का त्यौहार।।
“दस पापों की देहु आहूति, काम-क्रोध मद-लोभ मकार।”
“मोह-मत्सर आलस अरु हिंसा, चोरी संग तजो अहँकार।”
मनोकामना पूरी होती, विधि-विधान से समझो सार।
करो वन्दना श्रीरघुवर की, वे ही करते हैं भव-पार।।

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5 thoughts on “#Pratiyogita Kavita by Tej Vir Singh Tej

  • September 13, 2017 at 1:57 pm
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    Bahut sundar Tej sir. Mujhe bahut pasand aayee.

  • September 13, 2017 at 4:05 pm
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    अति सुन्दर रचना बहुत खूब

  • September 17, 2017 at 5:26 pm
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    सादर आभार आदरणीय

  • September 17, 2017 at 5:28 pm
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    सादर आभार आदरणीय गोस्वामी जी

  • September 17, 2017 at 5:30 pm
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    आपका बहुत बहुत आभार

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