#Pratiyogita Kavita By Vinita Badmera

“आज का रावण”

“अरे, ओ रावण!
तुमने पराई स्त्री को देख
मन ललचाया और
उसे बंधक बनाया;
तनिक स्पर्श न कर पाए,
फिर भी मारे गए तुम।

बरसों बाद भी पुतला
दहन किया जाता है
तुम्हारे नाम का।

लेकिन मुझे देखो,
मैं तो रोज गली के
नुक्कड़ पर खड़ा होता हूँ
घूरता हूँ हर स्त्री को
और फब्तियां कसता हूँ।

कभी-कभी तो
मैं नन्हीं बालिका को भी
उठा ले जाता हूँ,
करता हूँ अपनी हवस की पूर्ति।

किसी की भगिनी हो
या जननी,
मुझे नहीं कोई सरोकार
मेरी वासना नहीं पिघलती
उसके रुदन से।

पर मजाल है ,
कोई मेरा बाल बांका
भी कर पाया।”

यह कहकर
एक दैत्य अट्टहास
करने लगा।

रावण ने कहा उससे,
“मैं तो एक ही था उस युग में
पर आज के रावण तेरे
कितने रुप है
इंसान बना है तू,
पर सत्य तो यह है
तुझ जैसा कोई पातकी नहीं,
लेकिन राम भी तो नहीं हैं।
यदि जो आज का
राम भी होता तो
हर सीता की अस्मत
रक्षित होती ।

जो दुनिया मुझे बदनाम
करती वो तुझे भी तो
तेरे कुकर्म से पहचानती।”

विनीता बाडमेरा
अजमेर(राजस्थान)

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