#Pratiyogita Kavita by Vinod Sagar

कलयुग में ज़िंदा रावण का वज़ूद

मेले में रावण के पुतले को जलाकर
अपने घर लौटने के बाद जैसे ही
मैं कमरे में दाख़िल हुआ ही था कि
रावण के अट्टहास सुनकर मेरे तो
दोनों कान खड़े हो गएँ भय से…
वो बोला-‘‘क्यों मेरे योद्धा! जला आए
तुम मुझको रामलीला के ज़ुलूस में…?’’
‘मेरे योद्धा’ शब्द सुनकर मैं चकराया
साथ ही रावण को ज़िंदा देखकर
मैं भयभीत हो अंदर ही अंदर घबराया
पूछा-‘‘तुम ‘ज़िंदा हो अभी तक…?
और मैं तुम्हारा योद्धा हूँ, तो कैसे?’’
सुनकर रावण पहले तो मुसकाया
फिर बात को उसने आगे बढ़ाया
बोला-‘‘जिस प्रकार से पाँच तत्त्वों से
होता है निर्मित मानव का यह शरीर
ठीक उसी प्रकार मानव के पाँच अवगुण
‘काम, क्रोध, मद, लोभ और ईष्र्या’
एक साथ मिलकर बनाते हैं मुझ रावण को
और इन पाँच दोषों से तुम भी तो परे नहीं,
इसलिए तुम रामभक्त नहीं, मेरे योद्धा हो
और जब तक मनुष्य के विचारों में यहाँ
ये पाँच अवगुण विचरण करते रहेंगे
तब तक मुझको कोई नहीं मार सकता।’’
मैंने उत्सुकतावश रावण से पुनः पूछा-
‘‘फिर मुझसे ख़ुद को फूँकवाने का प्रयोजन?’’
रावण पुनः ज़ोरदार ठहाके लगाकर बोला-
‘‘शायद तुम्हें मालूम नहीं कि मेरा ही कुंभकरण
इस कलयुग में राम की भूमिका अदा कर रहा,
त्रेता में तो वह मात्र छह महीने ही सोता था
आज मगर, वह कलयुग में सालों भर सो रहा।
बस हमारी चाल की भनक किसी को न हो,
इसलिए वो अपने योद्धाओं को रामभक्त बनवाकर
पहले उनलोगों से रावण का पुतला बनवाता है,
और फिर एक साज़िश की तहत वह राम बनकर
देश के कोने-कोने में रावण के पुतले जलाता है।
फिर उसके बाद जीव-जन्तुओं की बलि दिलवाकर,
रावण के मरने का ज़श्न भी उन्हीं से मनवाता है।
तभी मैं कहता हूँ कि कलयुग में रावण अमर है,
क्योंकि त्रेता के राम ने मेरे भाई विभीषण को
अपने साथ मिलाकर मेरे तन का नाश किया था,
वहीं आज हमने उसके भक्तों को अपने साथ मिलाकर
कर रहा वध राम के तन और मन दोनों का,
ताकि रहे कलयुग में ‘ज़िंदा रावण’ का वज़ूद।

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