#Pratiyogita Kavita by Yogendra Pratap Maurya

विजयादशमी
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मुँह बाये फिर
खड़ा दशानन
जागो मेरे मीत
सिर पर चढ़कर
बोल रहा है
रोज-रोज ही दंगा
रोजी-रोटी की
चक्कर में
भटक रहा है गंगा
भ्रष्टाचार पहुँच
घर-आँगन
छींन रहा है प्रीत
बढ़ा प्रदूषण
और अशिक्षा
उपजा हुआ कुपोषण
महँगाई से
पेट है खाली
भरण हुआ ना पोषण
अच्छे दिन का
लेखा-जोखा
माँगे यहाँ अतीत
फिर आया है
विजयादशमी
मन में लिये उल्लास
पुनः मिटेगा
जलकर रावण
झूठ का होगा नाश
एक बार फिर
सच्चाई की
होगी देखो जीत
        •••
रचनाकार
योगेन्द्र प्रताप मौर्य
ग्राम-बरसठी
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