#Pratiyogita Kavita by Yogendra Sharma Yogi

जब से दिल को हम अपने
बेईमान बनाना सीख लिए हैं
तब से कद रावण का हम
हर साल बढ़ाना सीख लिए हैं।

मन के भीतर का जब से
हैवान जगाना सीख लिए हैं
लगता है तब से पुतले
हर साल जलाना सीख लिए हैं।

जब से कच्चे धागों से
हम नेह लगाना सीख लिए है
लगता रिश्तों का तब से
किरदार भुलाना सीख लिए हैं।

मर्यादा बोझिल लगती
बस गाल बजाना सीख लिए हैं
लेकर नाम धरम का हम
त्योहार मनाना सीख लिए हैं।

मिटी मनुजता मानुष से
हम आँख चुराना सीख लिए हैं
अपना दोष छुपाने का हम
पाठ पढ़ाना सीख लिए हैं।

जब से अहम के पत्थर से
हम घाट बनाना सीख लिए हैं
लगता नदी किनारे तब से
नाव चलाना सीख लिए हैं।

स्व गौरव का जब से हम
व्यापार सजाना सीख लिए है
तब से “योगी” लगता कि
हम राम भुलाना सीख लिए हैं।

जब से दिल को हम अपने
बेईमान बनाना सीख लिए हैं।।”योगी”

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