# Kavita by Acharya Amit

इश्क़ एक ख़्वाब रहा

बचपन से काश!

वो ख़्वाब ही रहता तो

बेहतर था मुद्दतों का ख़्वाब

तुझसे मिलकर यूं

नाउम्मीद हो गया है

मानो फूल ने खिलने से इनकार

कर दिया हो

उजालों ने अंधेरों का

बहिष्कार सा कर दिया हो

तमन्नाओं ने मचलने से

इनकार कर दिया हो

और दिल ने मुहब्बत का

ऐतबार बन्द कर दिया हो

काश! ये ख़्वाब -ख़्वाब ही रहता

वो बचपन का ख़्वाब जो

किस्से कहानियों में सुना करते थे

और हम भी किसी से

ख़्वाबों में अपनी

मुहब्बत का दम भरते थे

काश! बचपन का यह ख़्वाब

ख़्वाब ही रहता।

आचार्य अमित

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One thought on “# Kavita by Acharya Amit

  • September 20, 2017 at 5:36 am
    Permalink

    Nice sir keep it continues

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