#Pustak Samiksha by Kavi Rajesh Purohit

पुस्तक समीक्षा
कृति :- अट्टहास
प्रधान संपादक :- अनूप श्रीवास्तव
अतिथि संपादक:- विनोद कुमार विक्की
पृष्ठ:- 56
सम्पादकीय कार्यालय:- 9,गुलिस्तां कॉलोनी लखनऊ उत्तर प्रदेश
समीक्षक:- राजेश कुमार शर्मा”पुरोहित”
     युवा व्यंग्यकार विनोद कुमार विक्की की मेहनत रंग लाई। विक्की ने अट्टहास के प्रस्तुत हास्य व्यंग्य विशेषांक में  बिहार झारखण्ड के नवोदित व स्थापित व्यंग्य लेखकों की रचनाओं का शानदार तरीके से चयन किया है।
व्यंग्य लिखने का प्लॉट तैयार होता है समाज मे व्याप्त विभिन्न समस्याओं से चाहे वे राजनीतिक सामाजिक आर्थिक शिक्षा जगत की हो। व्यंग्य लेखक अपनी पैनी कलम से सारा हाल बयान कर देता है। हास्य की फुलझड़ियों में छिपे व्यंग्य आलेख दंशिकाएँ दोहों के माध्यम से व्यंग्यकारों ने बिहार व झारखण्ड की सूरत दिखाने का सार्थक प्रयास किया है।
   अतिथि संपादक विनोद कुमार विक्की ने “बिहार झारखण्ड की विसंगतियों से निकल रहा व्यंग्य” के माध्यम से बिहार व झारखण्ड राज्यों की सामाजिक आर्थिक राजनीतिक सांस्कृतिक जातिगत विसंगतियों रूपी रॉ मटेरियल की बात कहते हुए दोनों प्रदेशों के ख्यातिनाम व्यंग्यकारों व उनकी कृतियों का उल्लेख किया है।
   प्रस्तुत हास्य व्यंग्य विशेषांक में दोनों प्रदेशों के नवोदित व स्थापित व्यंग्यकारों की रचनाओं को शामिल किया है। व्यंग्यकारों की पैनी कलम मारक क्षमता की व्यंग्य मिसाइल तीखे व्यंग्य वक्र लेखन पाठकों तक पहुंचाने का बीड़ा उठाया है युवा व्यंग्यकार विनोद कुमार विक्की जी ने।
   पत्रिका के कार्यकारी संपादक रामकिशोर उपाध्याय लिखते है कि रूढ़िवादी जातिवादी मानसिकता दरिद्रता भूख ऊंच नीच अगड़े पिछड़े का विवाद आज भी ज्वलन्त समस्या है।आज चारों ओर राजनीतिक अवसरवादिता  और घोर स्वार्थपरता दिखाई देती है।
   सुभाष चन्दर “बिहार झारखण्ड की व्यंग गाथा में भगवती प्रसाद द्विवेदी डॉ. शिवशंकर मिश्र अरविन्द कुमार आदि व्यंग्यकारों का उल्लेख किया है।शशिकान्त शशि युवा व्यंग्य लेखन प्रमुख है।
   दिलीप तेतरवे के व्यंग्य का निर्यात में लिखते हैं कि देश मे कच्चे माल का इतना बड़ा स्टॉक तैयार हो रहा है  उसका भारत मे खपत कर पाना मुश्किल है। नेताओं द्वारा विदेशों के असंख्य दौरों पर भी व्यंग्यकार ने पैनी कलम चलाई है।
  “कंगाली में आटा गीला ” निलोत्पल मृणाल के व्यंग्य आलेख में भारत मे पुराने नोट बदलकर नई मुद्रा के आने के बाद विदेशों तक रुपया कैसे पहुँचता है। बैंक डकैती ,पुलिस व्यवस्था पर करारा व्यंग्य लिखा है।
”   राम हरण हो गए” सुबोध सिंह शिवगीत ने अपनी व्यंग्य रचना में नेताओं द्वारा झूँठ बोलने की वाचिक परम्परा को दशानन की संज्ञा दी है।
   नीरज नीर द्वारा लिखित “साहित्य शिरोमणि लल्लन” व्यंग्य  के माध्यम से बिना साहित्य साधना किए पुस्तक छपाने अखबारों में चित्र व खबरे छपवाने शीघ्र ही शिरोमणि कहलाने वाले नकली रचनाकार जो जोड़ तोड़ बैठाकर आगे बढ़ रहे हैं असल मे वे अपने पैरों पर कुल्हाड़ी चला रहे हैं। पोल खोलता लेख इस विशेषांक की आत्मा है।
    कृष्णचन्द्र चौधरी चले जन सेवा कर आएं में वे लिखते है कुर्सी पर बैठ जाना अपने आप मे एक बहुत बड़ी सेवा है। कुर्सी पर बैठने के लिए किन किन की पहले सेवा करनी होती है। शानदार लिखा। वैष्णव जन फटाफट सेवा कर रहे हैं।जनता अभी भी सड़क पर पड़ी है।
 श्वेता कुमारी सिंह “टाँग खिंचाई’ में कवयित्री चमेली पात्र के माध्यम से अखिल भारतीय कवि सम्मेलनों की सफलता की सच्चाई बताता है।
   अविनाश अमेय “बिहार झारखण्ड व्यंग्य परिदृश्य में श्याम सुन्दर घोष बालेन्दु शेखर तिवारी सिद्धनाथ कुमार सहित बिहार के पुरानी पीढ़ी के व्यंग्यकारों का जिक्र किया है।
   स्वाति श्वेता की व्यंग्य रचनाएँ “कैरेक्टर सर्टिफिकेट” व विनोद  विक्की के व्यंग्य आलेख मजबूरी का नाम मातृभाषा  आज़ादी ओर अच्छे दिन आदि का उल्लेख किया है।
   डॉ. अभिषेक कुमार का व्यंग्य “स्वदेशी हर्बल सिम” में आयुर्वेद योग के बढ़ते प्रचार प्रसार उत्पादक दवाईयां आदि पर हास्य व्यंग्य परोसा है।
  व्यंग्यत्मक दोहों में राजनीति में दागी लोगों की बढ़ती संख्या पर चिन्ता व्यक्त करते हुए लिखा कि” आधे से कम ही रहे,दल में दागी लोग।
सख्त बहुत होने लगा है,चुनाव आयोग।।
वास्तव में आज चुनाव आयोग का रवैया सख्त है। सख्त ही होना चाहिए लोकतन्त्र के लिए।
 ”  हम तो बन्दर ही भले” में विजया नंद विजय ने देश मे व्याप्त समस्याओं की ओर ध्यान आकृष्ट करवाने का प्रयास किया है। जातिवाद आतंकवाद महिला उत्पीड़न से लोग दुखी है। लोग जाति धर्म के फसाद कर रहे है। बंदत मन्दिर मस्जिद चर्च गिरजा सब जगह बैठते हैं। आदमी को सब धर्मों का आदर करना चाहिए।
  मजदूरों की विवशता सूखे दरख़्त है जाती भरी विषबेल परजीवी के खेल
ऐसी पंक्तियाँ इस अंक की जान है।
  विप्लव वर्मा की कुंडलियां साबरमती से सेवाग्राम सर्जिकल स्ट्राइक का सुंदर वर्णन किया है।
  बिहार झारखण्ड समकालीन व्यंग्य लेखन परिदृश्य कि सम्भावनाएँ ओर चुनोतियों को गोपाल चतुर्वेदी सुरेश कान्त कैलाश मण्डलेकर सूर्यबाला संतराम पांडेय भगवतीप्रसाद द्विवेदी के विचार सारगर्भित लगे।
  अभिजीत कुमार दुबे के व्यंग्य बिहारी बाबू में लटकन चाचा के बेटे का दिल्ली आई ए एस की तैयारी में जाते समय का रोचक प्रसंग में वर्तमान में व्याप्त समाजवाद का सच सामने रखा है वे लिखते हैं हम बिहारी समाजवाद में विश्वास करते है चारा भी मिल बाँटकर हजम कर लेते हैं। बिहार की शिक्षा व्यवस्था व मूल्यांकन पर भी करारा व्यंग्य लिखा। बिहारी हर हाल में मस्त रहता है। लोग बिहारियों को कार्टून कहते हैं। बिहार में रेल व्यवस्था नहीं सुधरी रेलों की संख्या जरूर बढ़ी है। आज भी बिहार सहित देश मे जातिवाद है। तू जात की बहू लाना। व्यंग्य में लिखा गया है।
  हिन्दी के गले मे अंग्रेजी पट्टी, बैंक ऋण, निर्वाण दिवस,अबला नहीं बला है नारी,भक्त होने का मतलब ब्रेकिंग न्यूज, बाबाजी की दुकान,इंटरव्यू,रावण दहन, बिहारी भैया, ख्यालों की दुनिया, सहयात्री,उफ ये रेल यात्रा, फाइटिंग गर्ल, नेता का कबूलनामा,सरकार स्त्रीलिंग,मैं उनकी गंगोत्री हूँ न! आदि व्यंग्य भी महत्वपूर्ण हैं।
  अट्टहास पत्रिका के हास्य व्यंग्य का यह विशेषांक प्रधान संपादक कार्यकारी संपादक अतिथि सम्पादक सहित पूरी टीम का श्रम है। प्रस्तुत अंक की तरह विक्की जी के संपादन में इसी तरह एक से बढ़कर एक विशेषांक प्रकाशित होंगे इसी विश्वास के साथ हार्दिक बधाई।
– राजेश कुमार शर्मा”पुरोहित”
 समीक्षक,कवि, साहित्यकार
98,पुरोहित कुटी,श्रीराम कॉलोनी
भवानीमंडी जिला झालावाड़
राजस्थान पिन 326502

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