B 0207 – Rifat Shaheen


Nazm:

मुझे धड़कनों में तलाश कर

तेरी धड़कनों में ही हूँ कही

जो वहां नही तो कहीं नही

तू ये याद रख मेरे हमनवां

मुझे ढूंढने की जो चाह है

तो क्यों ढूंढते हो यहाँ वहाँ

मैं यूँ जा बजा तो गई नही

मेरे हमसफ़र है तेरी क़सम

मैं किसी जगह भी रुकी नही

किसी ठौर भी तो रुकी नही

मुझे धड़कनों में तलाश कर……

तेरी जुस्तज में घिरी रही,

तेरी आरज़ू में घुली रही

तेरे ज़ुल्म जब्र भी पी गई

मैं तो आंसुओ में थमी रही

मुझे धड़कनों में तलाश कर……..

तेरे कुर्ब की ही तलाश है

तेरे लम्स की ही तो प्यास है

तू मिला तो शमआ पिघल गई

तेरी आंच दिल में उतर गई

मुझे धड़कनों में तलाश कर……….

तेरे बाज़ुओं में खिली रही

तेरी खुश्बुओं में बसी रही

तेरे साथ ही तो है ज़िन्दगी

तू ही ज़िन्दगी मेरी ज़िंदगी

मुझे धड़कनों में तलाश कर

तेरी धड़कनों में ही हूँ कहीं

जो वहां नही तो कहीं नही

तू ये याद रख मेरे हमनवां

 

 


Nazm:

वो सर्द रात ,
वो सावन वो भीगा भीगा बदन
वो थरथराते लबों का लबों पे छा जाना
वो उँगलियों को फँसा कर किसी के हाथों में
ज़रा से झटके से कुछ और क़रीब ले आना
वो गर्म सांसो की खुशबु,
वो ज़ुल्फ़ के साए
वो थामना उसे चुपके से और सरगोशी
मेरी वफ़ाएं भी करती थी उसकी पां बासी
वो नूर था मेरी रातों का दिन का सूरज था
बड़ा हसीन समां वक़्त खूबसूरत था
तेरे ख़याल के रेशम से बुन रही थी मैं
हसीन ख़्वाब की रंगीन झालरें लेकिन
हवा के एक थपेड़े ने यूँ सितम ढाया
ज़रा सी देर में बिखरा मेरा नशेमन था
तुझे भी अब तो मेरी जुस्तज न थी शायद
किसी को भी मेरी आरज़ू न थी शायद
है सर्द रात भी,सावन भी,भीगा भीगा बदन
पर उसमे तेरी वफाओं की आँच आज नही


ग़ज़ल:

ए नसीम ए सहरी जा मेरे महबूब के घर
कहना बेचैन है कोई तेरे वादों की कसम
रात होती है तो आहों में गुज़र जाती है
और सुबह के उजालों में भटकती है नज़र
मेरे आँचल को हवाएं जो हिला देती है
मेरी आँखों को कई बार रुला देती है
याद आते है मुझे पल वो सुहाने जब हम
हाथ में हाथ लिये गुज़रे थे इन्ही राहों पर
गुलों बिखरी ये शबनम नही आंसू है मेरे
पलकों पे ठहरे हुए आस के जुगनू है मेरे
बुझ न जाये कहीं उम्मीद का मद्धम सा दिया
आ भी जा टूटती सांसो की कसम है तुझ पर
गमे जाना, गमे हस्ती,गमे उल्फ़त की कसम
तुझको है आज मेरे दर्द ओ हसरत की कसम
तू भरम रख ले रिफ़अत का
तुझे चाहत की कसम
हो न ऐसा के गुज़र जाये मुहब्बत की उम्र


नज्म :

मुझे अच्छा लगता है जब तुम भरी भीड़ में मेरा हाँथ थाम लेते हो

और कहते हो

साथ साथ चलो न

मुझे अच्छा लगता है, जब तुम मेरी तरफ देख कर कहते हो

थक तो नही गई

और मेरा बोझ ख़ुद उठा लेते हो

मुझे अच्छा लगता है जब मेरी तरफ उठती नज़रों को तुम नागवारी से देखते हुए मुझे अपने हिसार में ले लेते हो

और कहते हो चलो यहाँ से

मुझे अच्छा लगता है

जब तुम कहते हो ,मैं हूँ न

मुझे अच्छा लगता है जब मेरे सोये बदन पर कंबल डालते हुए कहते हो

लापरवाह हो तुम,ठण्ड लग जाएगी

मुझे अच्छा लगता है जब तुम कहते हो

मेरे साथ चलो,देखो अकेले मत जाना

मुझे अच्छा लगता है, जब तुम कहते हो

दुपटटा तो ओढो

मुझे अच्छा लगता है, जब तुम कहते हो चलो जल्दी सो जाओ

मुझे अच्छा लगता है, जब तुम कहते हो

मेरे साथ ही खाओ

मुझे अच्छा लगता है, जब तुम इतनी सारी बंदिशें लगाते हो

और कहते हो

तुम सिर्फ मेरी हो

बंदिशें भी प्यारी होती है

बशर्ते उसमे मुहब्बत और क़ुरबानी हो

गुलामी नही…..

 


नज्म :

मैं
ऐसा महसूस कर रही हूँ
के तुम यहीं हो यहीं कहीं हो
मेरे सुखन में मेरे चलन में
मेरे ख्यालों की अंजुमन में
मैं ऐसा….
के तेरी खुशबु में मेरी सांसे रची बसी है
तुम्हारी आहट मैं सुन रही हूँ
मैं बुन रही हूँ तेरे ख्यालों के रेशमी आंचलों को
मैं सोचती हूँ के तुम मिले तो
मैं ये कहूंगी,मैं वो कहूँगी
तुम्हारा दामन मैं थाम लुंगी
न जाने दूंगी कहीं मैं तुमको
मगर ये सच है के तुम नही हो
असल में बस इक ख़याल हो तुम
यहाँ नही हो , मैं फिर भी ये महसूस कर रही हूँ
के तुम यहीं हो यहीं कहीं हो


Gazal :

जागो के ज़िन्दगी के नज़ारे जवान है
अरमां भी देखो आज हमारे जवान हैं
तुमको खबर नही के जवां जिस्म में अभी
जज़्बात के कितने ही शरारे जवान है
सुबहे बहार आई है अंगड़ाई लेके उठ
बुए नसीम माह ओ पारे जवान है
चमका है चाँद देख मुहब्बत के अर्श पर
और आसमां में कितने सितारे जवान है
न जा ठहर के आज की रुत है हसीनतर
सदक़ा नज़र से आज उतारें जवान है
तुमको ख़ुदा का वास्ता यूँ बेख़बर न हो
रिफ़अत की आरज़ू की बहारें जवान है


Gazal :

मैं अपने प्यार की अज़मत से मार डालूंगी
तुझे मैं अपनी मुहब्बत से मार डालूंगी
तू मेरी अर्ज़ ए वफ़ा प निगाह कर वरना
तुझे मैं जान शिकायत से मार डालूंगी
तेरे बगैर कटेगी न ज़िन्दगी हमसे
मैं अपने आपको इज़्ज़त से मार डालूंगी
वफ़ा के नाम को बदनाम कर नही सकती
इसे जतन से हिफाज़त से मार डालूगी
तू अपने पास ही रख ज़ुल्म के बही खाते
मैं तुझको यार इनायत से मार डालूंगी
ज़माना ढूंढता रह जायेगा मुझे रिफअत
मैं अपने नाम की शिद्दत से मार डालूंगी


Gazal :

ऐसी मख्मूर निगाहों से न देखा कीजे

मिरे जज़्बात को हर रोज़ न परखा कीजे

हम मुहब्बत के तलबगार है इस तरह के बस

हमको खुशबू की तरह पास में रक्खा कीजे

टूट जाएँ न कहीं कांच की दिवार है हम

संगमरमर की तरह हमको न बरता कीजे

हम परसतारे वफ़ा हैं कोई ताजिर तो नही

कब कहा हमने के ऊँ इश्क़ का सौदा कीजे

जान उल्फत का कोई मोल नही आप इसे

बेवफाई के तराजू प न तोला कीजे

 


Gazal :

देखा नज़र ने आपको और ले लिया हमे

शुक्रे ख़ुदा करें के तुझे दे दिया हमे

चेहरा कँवल है आपका बातें ग़ज़ल सी हैं

हम क्या कहें के आपसे क्या क्या मिला हमे

खुशबु बदन से फूटती जाती है इस तरह

गुलशन का मिल गया है कोई सिलसिला हमे

तुम शाहकारे हुस्न हो इश्के जहान हो

इस मद भरी नज़र से ज़रा मय पिला हमे

दामन महक उठा है तुम्हारे शबाब से

तक़दीर से नही है ज़रा सा गिला हमे


Kahani –

नरगिस

***

उस रोज़ जब पहली बार नर्गिस ने मुझसे कहा कि,

“मुझे मेरा हक़ चाहिये,, तो मैं हैरान रह गया। और सवालिया नज़रों से उसे तकने लगा।

ऐसे क्या देख रहे हो? नर्गिस ने कहा

कुछ नही ।

पर मेरा सवाल?

कैसा हक़ चाहिये तुम्हें मेरी जान? सब कुछ तो है तुम्हारे पास। मैं,मेरी वफ़ा,मेरी मोहब्बत तो अब क्या चाहिये?

हुंह सब कुछ…नर्गिस ने मुझे शिकायती नज़रों से देखा और उठ कर चली गई।उसके जाने के बाद मैं सोचने लगा… नर्गिस मेरी ज़िंदगी में आने वाली वो औरत है ,जिसे मैंने टूट कर चाहा न जाने कौन सी अनोखी बात थी उसमें कि, मैं उसकी तरफ खींचता चला गया।उसकी हर अदा मेरा मन मोहने लगी ।उसके पास होता तो उसे खुश रखने की तरकीबें खोजता रहता।दूर होता तो उसे खोने का खौफ करार न लेने देता।मेरी सोच हर लम्हां उसकी हस्ती का तवाफ़ करती रहती।मगर फिर भी उसके हसीन चेहरे पर इत्मीनान की परछाईं कभी नही देख पाया। पहले मैं इसे अपना वहम समझता रहा ,मगर आज नर्गिस के ये जुमले कि “मुझे मेरा हक़ चाहिये” मुझे परेशान कर गया।मैं सोचने लगा । कौन सा हक़ चाहती है वो?

मेरी जायदाद में हिस्सा,मेरे कारोबार में शेयर,या फिर इससे भी कुछ ज़्यादा??

क्योंकि इन सबके अलावा तो मैं उसे सब कुछ दे चुका था।अपनी मुहब्बत,अपनी वफ़ादारियां ,और मुलाकातें।इसके बावजूद भी नर्गिस की उदास आँखे,सिलवटों भरी पेशानी और थरथराते लब…? मैं उलझ कर रह गया। तब मुझे लगा औरतें ऐसी ही होती है।उन्हें मुहब्बत की शीरनी से ज़्यादा सिक्कों की खनक पसंद होती हैं,वफ़ा की खुशबु से ज़्यादा गहनों की चमक पसंद होती हैं । मैंने सोच लिया था कि अब मैं नर्गिस से सारे रिश्ते खत्म कर लूंगा और एक बड़ी रकम उसके हवाले करके उससे अपनी मुहब्बत वापस ले लूंगा। मैं इन्ही सोचों में गम था कि कॉलबेल बजी मैंने उठ कर दरवाज़ा खोला तो सामने वही क़ातिल थी यानि नर्गिस

मैं उठा और अलमारी की तरफ बड़ा की रकम निकाल सकूँ तभी पीछे से मुझे किसी ने कस का भींच लिया। मैं घबरा कर पलटा ,वो नर्गिस थी मं कुछ कहता इससे पहले ही उसने मेरे होंटों पर अपने थरथराते होंठ रख दिए और मेरे जिस्म से बेतरह लिपटे मेरे लाल पड़ चुके कानो के पास बुदबुदाई

सलीम! आज तो मुझे मेरा हक़ दे दो।


Kahani –

___पान_____
अजीब शख़्स था वो । जिसे लोग मेरे शौहर के रूप में जानते पहचानते थे।दोस्ती करने की कला में माहिर…ऊं चुटकियों में लोगों को अपना दिलदादा बनाता कि ,मैं हैरान रह जाती।और उसकी इस आदत से कोफ़्त भी होती।एक तो मुझे उसकी ये आदत पसंद नही थी ऊपर से जिससे भी वो दोस्ती करता उसकी कोई फ़ुज़ूल सी आदत भी अपना लेता।मेरा मन उसकी हरकतों से ऊब जाता तो मैं शाहनीला के घर चली जाती ।वो मेरी पड़ोसन भी थी और हमदर्द सहेली भी।वही एक थी जिसे मैं अपना दुखड़ा सुना कर मन हल्का कर लेती । शाहनीला अपना बड़ा सा पानदान खोल कर लौंग इलायची वाला बीड़ा बनाती और मेरी तरफ बढ़ा कर कहती।छोड़ यार! क्यों मूड खराब करती हो?आखिर मर्द है वो दोस्त यार तो होंगे ही उसके।शाहनीला की भी एक आदत मुझे पसंद नही थी। वो पान बहुत खाती थी।एक बीड़ा खत्म नही की दूसरा मुंह के अंदर।मैं सोचती शुक्र है कम से कम मेरे शौहर को ये आदत तो नही है । मैं शाहनीला का दिया बीड़ा मुंह में दबा तो लेती मगर उसका कड़वा कसैला ज़ायक़ा मेरे ज़िस्म में एक अजीब सी सिहरन पैदा कर देता।
उन दिनों उसकी दोस्ती किसी गवैये से हो गई थी ।वो रत गये घर लौटता तो अजीब,अजीब बेढंगे गाने सुना ,सुना कर मुझे रात भर परेशान करता।फिर एक दिन वो अफसाना निगारी पर उतर आया,फिर मुस्व्वारी पर,।तंग आकर मैं मैके चली गई।गुस्सा इतना था कि पूरे दो महीने नही लौटी। और प्यार इतना था कि उसके खाने की ज़िम्मेदारी शाहनीला पर छोड़ आई थी। कुछ रोज़ बाद मैं अचानक वापस भी आ गई। तो देखा वो बड़ा सा पानदान खोले बेड पर बैठा है और आराम से लौंग इलायची वाला पान चबा रहा है। मेरे मुंह से बेसाख्ता निकला….उफ़ शाहनीला………?


Kahani –

दो अजनबी
ज़िन्दगी में किसी की कमी नही थी,फिर भी उससे मुलाक़ात हो गई।मुलाक़ातों में लुत्फ़ आया,फिर जज़्बात,फिर न मिलने पर बेचैनियां और फिर क़ायम हुआ एक रूहानी रिश्ता। यक़ीनन ये खुदा की तरफ से था ,वरना इस मुलाक़ात की किसे तमन्ना थी? न उसे, न मुझे…..


Kahani –

सुगन्ध
***
उस पीली चांदनी के भव्य और शांत सौंदर्य में,उसे एक मार्दव सुगन्ध ने या घेरा।वह सोचने लगा,ये शांत विश्रांत रात्रि तो मधुर निद्रा के लिये होती है,परन्तु कौन है,जो इस शांत रात्रि को काव्यत्मक्ता और अलौकिकता प्रदान कर रहा है? प्राणों को सिंचित करने वाली रात्रि के आंचल पर अपनी सुगन्ध बिखेरने वाली ये सुगन्ध कदाचित है कौन? मन में इसी प्रश्न को लिये वो डाक बंगले की प्राचीरों के अँधेरे कोने में अस्पष्ट सी परछाईं की ओर बढ़ने लगा। निकट पहुँच कर उसने हाँथ बढ़ा कर उस सुगन्धमयी को स्पर्श किया। और तब वह सुखद आश्चर्य से पुलकित हो उठा ,जब उसकी हथेलियाँ मालती के फूलों से भर गईं थीं।


Kahani –

खशबू

****

कई दिनों से मैं उसे बहुत प्यार भरी नज़रों से देख रहा था। उसका हुस्न,और अभी अभी फूटा शबाब उसके वजूद की रानाइयों में चार चाँद लगा रहा था।रात के गहरे सन्नाटे और चाँद तारों की हमराही में वो अपना घूंघट उतार देती और अपने निखरे वजूद में ग़ज़ब सा ढाया करती।तब मैं अपनी ज़ात से बेनियाज़ आस पास के माहौल से बेखबर उसे घंटों निहारता रहता ,उसके वजूद से उठने वाली खुशबु को एहसासों के प्याले में भर,भर कर पीता। वो जो मेरी शबे परेशां का एक हिस्सा बन चुकी थी ,अपनी पुरबहार ज़ात से मेरी रातों को आरास्ता किया करती।मेरे वजूद को अपनी ज़ात से उठती खुशबु की डोर से अपनी तरफ खैंच लिया करती ।अपने सब्ज़ पैराहन पर सफ़ेद दुपट्टा ओढे वो कोई शहज़ादी मालूम होती। या दूर देश से चांदनी के रथ पर सवार कोई रानी।

हाँ वो रानी ही थी ….रात की रानी (एक सुगन्धित पुष्प)

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