0213 – S K Gupta

Gazal:

दिल मेंं  ख्वाहिशें  मेरे भी तमाम थी

जब छोड़ गए  उम्र बाकी  तमाम थी

 

तुमको कहा  चांद तो तुम दूर हो गये

तीरगी  आसपास  बिखरी तमाम थी

 

जिंदगी ने भी मोड़  कोई नया न लिया

रफ्ता रफ्ता उम्र ही हो चुकी तमाम थी

 

दिन तो कट गए रातें कटी मुश्किलो में

अजाब यह कि तनहा  कटी तमाम थी

 

मेरा जिक्र तुमने अपनी गजल मे किया

मेरे लिए तो यही खुशफहमी तमाम थी

 

मरते वक्त शिकवे गिले सब दूर हो जाते

एक आरजू दिल मेंं  बस यही तमाम थी

 

तुमने मेरा दिल से कभी बुरा नही चाहा

खुदा की मुझ पर नेमतें बरसी तमाम थी

 

 


Gazal :

वो तमाम घर मेंं खुशी बिखेर देती थी
नए से लहजे की हंसी बिखेर देती थी

सुबह जब मेरी आंख नहींं खुलती थी
हंस के मुझ पर पानी बिखेर देती थी

भीगे रेशमी बालों को लहराकर अपने
नथुनों में महक सोंधी बिखेर देती थी

अपने कंधे से सरका के पल्लू हौले से
मेरे वजूद में भी मस्ती बिखेर देती थी

दिल मेंं रूमानियत का ख्याल आते ही
नज़र में अपनी मर्ज़ी बिखेर देती थी

उसकी नरम पलकों की हया सतरंगी
मेरे चेहरे पर चमक सी बिखेर देती थी

इतरा कर चलती हुई छन छन करती
वो मेरे सहन में मोती बिखेर देती थी


Gazal :

जिंदगी सोने की खान नहींं होती
हर चेहरे पर मुस्कान नहींं होती

नीचे दलदल है और ऊपर आग
राह कोई भी आसान नहींं होती

यूं आखों मेंं आखें ड़ालकर भी
आदमी को पहचान नहींं होती

सारा खून निचोड़ कर रख दिया
गरीबों की क्या जान नहींं होती

मुझको देख कर फूल मुरझा गए
काटों में ही तो जान नहींं होती

दिल मेंं हर वक्त कसकता है कुछ
बातें हमारे दरमियान नहींं होती

मुझे तनहाई का एहसास होता है
अब मुझसे ऊंची उड़ान नहींं होती

बदल कर तो हम भी नई ले आते
जिंदगी की ही दुकान नहींं होती


Gazal :

मौसमे बहार का पता नहीं चलता
वक़्त की मार का पता नहीं चलता।

कितने पहाड़ मिट्टी में समा गए
किसी के मेयार का पता नहीं चलता।

इस मुफ़लिसी ने घेर लिया जब से
किसी भी यार का पता नहीं चलता।

मैं क्या करता मना कर दिया तूने
तेरे तो करार का पता नहीं चलता।

एक सा ही है वस्लो हिज्र का मौसम
हमें तो प्यार का पता नहीं चलता।

मेरे ख़िलाफ़ रची साज़िशें किस ने
उस क़िरदार का पता नहीं चलता।

तू भी हो जाएगा बदनाम मेरे साथ
इश्क़ के वार का पता नहीं चलता।

ज़िन्दगी का लुत्फ़ तो कहीं और है
बस उस दयार का पता नहीं चलता।

चुका देते हैंं हम भी रोज किस्तों मेें
अब हमे उधार का पता नहीं चलता।

मेयार – स्तर , वस्लो हिज्र -मिलन जुदाई
दयार – शहर


Gazal :

मुहब्बत मेंं वायदे तुम्हे भी निभाने हैंं
मुहब्बत में वायदे हमें भी निभाने हैं

क्यों नहींं समझते हो बात जरा सी
शमां पर पतंगे तो आने ही आने हैंं

लोग लम्हों की कीमत नही समझते
लम्हा लम्हा कर बीत जाते जमाने हैंं

नाम उनका आया जब मेरे साथ में
तब पता चला वह भी मेरे दीवाने हैंं

बार बार तौबा हमारी टूट जाती है
साकी तेरे पास भी तो वह पैमाने हैंं

इश्क़ का हमें कोई तजुरबा नही है
कहने को हम भी आशिक़ पुराने हैंं

कह दो मौत से अभी रूक कर आए
जब तक हम हैंं तब तक ही जमाने हैंं


Gazal :

काश जिंदगी किसी दूकान पर बिकती

तरह तरह के रंगों में सजी हुई दिखती

खरीदने वालों की भी भीड़ लगी रहती

खरीदते वो जो हमे सबसे अच्छी लगती

मोल ज्यादा देकर खरीद लेता मैं भी तो

जो मुझे खूबसूरत बहुत हसीन दिखती

दिल को भी कितना सुकून मिलता मेरे

लिबासे वफा पहन कर साथ मेरे रहती

कितना खूबसूरत मंजर होता वह भी तो

जो दिल मेरा चाहता वही तो वह करती

मेरे ही इशारों पर वहआसमान छू लेती

मुझे कभी आजमाने की जुर्रत न करती

सारी ही मुश्किलों का हल निकल आता

काश जिंदगी किसी दूकान पर बिकती


Gazal :

काश जिंदगी किसी दुकान पर बिकती
खरीदते वो जो हमे सबसे अच्छी लगती

खरीदने वालों की भी भीड़ लगी रहती
तरह तरह के रंगों में सजी हुई दिखती

मोल ज्यादा देकर खरीद लेता मैं भी तो
जो मुझे खूबसूरत बहुत हसीन दिखती

दिल को भी कितना सुकून मिलता मेरे
लिबास वफा का पहन साथ मेरे रहती

कितना खूबसूरत मंजर होता वह भी तो
जो दिल मेरा चाहता वही तो वह करती

मेरे ही इशारों पर वहआसमान छू लेती
मुझे कभी आजमाने की जुर्रत न करती

पुरानी हो जाती तो नई बदल के ले आते
काश जिंदगी किसी दुकान पर बिकती

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