#Samiksha by Avdhesh Kumar Avadh

सकारात्मक परिवर्तन के लिए ‘खोजना होगा अमृत कलश’

 

समीक्षक : अवधेश कुमार ‘अवध’

 

कृति : खोजना होगा अमृत कलश (काव्य संग्रह)

रचनाकार: श्री राजकुमार जैन ‘राजन’

संस्करण : प्रथम, 2018

प्रकाशन : अयन प्रकाशन, नई दिल्ली – 110030

मूल्य : रुपये 240 मात्र

सम्पर्क नं. 9828219919

 

हृदय रूपी सागर में भावनाओं का तूफान जब चरम पर पहुँचकर द्रवित होता है तो एक कविता प्रस्फुटित होती है। जब परम्पराओं, कुप्रथाओं, रूढ़ियों एवं हमारी आदतों का समुच्चय चारों ओर से हमें जकड़े रहाता है, अंधकार पहले से और घना होता जाता है, नियति गुलामी को शाश्वत करने लगती है और परछाई भी साथ छोड़ने लगती है फिर भी आशा की एक नीम किरण कहीं हिम्मत जगा जाती है तो वहीं से उद्भव होता है कवि श्री राजकुमार जैन “राजन” जी की काव्य कृति “खोजना होगा अमृत कलश” का।

 

गुलामी में आजादी का, शोषण में क्रान्ति का, अंधकार में प्रकाश का और निराशा में उम्मीद का बीज जो अंकुरित कर सके उसी का नाम है अमृत कलश जिसे खोजने हेतु प्रेरित ही नहीं अपितु उद्घोष भी करता है कवि ” खोजना होगा अमृत कलश” के रूप में।

 

“खोजना होगा अमृत कलश” 120 पृष्ठों में 50 कविताओं का अद्भुत काव्य संग्रह है जिसे रचनाकार ने विनम्र भाव से माता – पिता को समर्पित किया है। गौलवशाली भारतीय संस्कार व संस्कृति की गर्त में धँसी गहरी नींव जिसपर वैश्विक सदाचरण का ताना – बाना तना हुआ है, के गर्भ से अभ्युत्थान की अँगड़ाई का आभास है खोजना होगा अमृत कलश।

 

जैसे अंधकार और प्रकाश एक दिवस के दो अनिवार्य फलक हैं वैसे ही जीवन भी सुख व दु:ख, हार व जीत तथा उत्थान व पतन से मिलकर बना होता है। कवि कहता है कि, “एक हाथ बसंत/दूसरे में पतझड़ लिये/ चलते ही रहेंगे, चलते ही रहेंगे।” सही मायने में यही तो है जीवन जो जो हार में भी जीत का आभास कराता है और पुन: नवल प्रयास हेतु साहस देता है, “जीत नहीं पाया तो क्या/ हारा भी नहीं हूँ मैं।”

वर्तमान को खुलकर जीने के बजाय हम भविष्य के प्रति असुरक्षित महसूस करते हुए बड़ी- बड़ी लालसाओं के जखीरे में खुद को घेर लेते हैं। परिणाम यह होता है कि वर्तमान में प्राप्त सुख में भी खुश नहीं हो पाते क्योंकि भविष्य के प्रति आशंकित रहते हैं। कवि की लेखनी इस ओर ध्यान दिलाती है, “वर्तमान इतना बुरा भी नहीं कि/ उसे भविष्य का लबादा ओढ़ाया जाए।”

 

“मेरा अस्तित्व रिश्तों को ढोते ढोते / खण्ड- खण्ड हो गया” में कवि कुछ पल के लिए आमजन हो जाता है वैसे ही जैसे महाप्राण निराला जी “राम की शक्ति पूजा” या “सरोज स्मृति” में हो जाते हैं किन्तु अगले ही पल कवि स्वप्रकाशित होकर स्वस्फूर्त हो जाता है। दोहरापन की व्याधि मानव को हर तरफ से जकड़ती जा रही है। रिश्ते रिसने लगे हैं आजकल। कवि निशाना साधता है इन पंक्तियों में, “रिश्ते आजकल/ कटुता की हल्की – सी आँच में भी/ भाप बन उड़ जाते हैं/ दोहरा जीवन, दोहरे प्रश्न/ हर जगह दोहरापन/ आखिर अपनी पहचान/ बताना चाहूँ तो कैसे?” कवि को आगे कहना पड़ता है कि  बड़ी सावधानी से आम आदमी के गले के नीचे “कर्मण्येवाधिकारस्ते” का मन्त्र उतारकर नेता लोग अकर्मण्य बने रहते हैं।

 

मनुष्य जब अकेला होकर एकान्त में अपने अनुभवों में चिंतन की चासनी मिलाकर चखता है तो वास्तविक स्वाद को समझ पाता है। “एकान्त अनुभव” में कवि राजन को ऐसे बहुत से अनुभव होते हैं। “जीवन का चक्रव्यूह” में लोककवि की भूमिका निभाते हुए आलोच्य कवि का आशावादी आह्वान मुखर होता है, “हताश मत हो मेरे दोस्त!/ हर ख्वाब सूरज बन चमकेगा/ एक दिन।”

 

दर्जनों बाल पुस्तकों का रचनाकार विभिन्न भाषाओं में अनुवाद के माध्यम से अपने को स्थापित करने में सक्षम हो चुका है। राजस्थान के मरुस्थल से ब्रह्मपुत्र की घाटी और मेघालय के आँगन तक जाना – पहचाना जाता है यह रचनाकार। न छंदों का व्यामोह और न अलंकारों का अतिरिक्त बोझ। न भाषाई द्वन्द्व में दुरूह शब्दों की अनिवार्यता न व्याकरण का कठोर बंधन। न चमत्कार की व्यंजना न अतिरेक बौद्धिक व्यायाम। न अतीत को उलाहना न भविष्य को मुट्ठी में कैद करने की मृगतृष्णा। अप्राप्य की आदर्श मंशा से परे सीधा – सटीक नंगी आँखों से निष्पक्ष होकर समाज को देखना और सही दिशा देने का प्रयास करना। एक सच्चे साहित्यकार से और क्या चाहिए!

 

‘जिजीविषा’, ‘रोशनी के पहरुओं’, ‘व्यामोह’, ‘हथेली में सूरज उगाओ’ तथा ‘अस्तित्व – बोध’ को इस संग्रह की प्रतिनिधि कविताएँ मान सकते हैं। श्री वेदव्यास जी और श्री घनश्याम मैथिल ‘अमृत’ जी की अभिव्यक्ति रूपी आशीष और कृतिकार की सहज स्वीकारोक्ति पुस्तक में चारु चाँद जड़ रहे हैं।

 

कृतिकार शहरी जीवन के बनावटी चकाचौंध एवं दौड़ती जिंदगी और उसके कश्मकश को बहुत नजदीक से जीया है। उतर गया है अन्त: तक पड़ताल करने के लिए। सर्वहारा वर्ग, सूनी तरुणाई, लाचार अन्नदाता, असीमित दायित्व में दबी अस्तित्व खोती नारी एवं जाति, मजहब, भाषा, क्षेत्र व असंतोष में बिखरा हुआ भारत रचनाकार को अपनी ओर खींच नहीं पाता है। सीमित दायरे का दोष मढ़ा जा सकता है आलोच्य कृति पर। यत्र – तत्र कवि जादूगर या यूँ कहें कि देवदूत सा लगता है जो किसी भी विषम परिस्थिति में निराश नहीं होता अर्थात् महामानव के तमाम गुण देखे जा सकते हैं कवि को जन सामान्य से पृथक करता है। यद्यपि कोई भी कृति कृतिकार के लिए अनमोल होती है और होनी भी चाहिए तथा लाख सावधानियों के बावजूद भी कुछ एक दोष निकल ही आता है और इसका कारण होता है पाठकों की असीमित अपेक्षा……अनन्त चाह…..सीप में सागर की ख्वाहिश…..।

 

मूर्त धरातल पर “खोजना होगा अमृत कलश” हमारी प्राचीन धरोहर में निहित अमृत से अमरत्व प्राप्ति की अवधारणा पर आधारित शीर्षक को सार्थक करता हुआ अमर काव्य संग्रह है। समस्त कविताएँ छंदमुक्त हैं इसके बावजूद भी अदृश्य गति एवं लय व्याप्त है जो कलमकार की साधना का पारितोषित है। विषयों की विविधता और विचारों का विस्तृत आयाम पाठक को बाँधे रहने में सफल है परिणाम स्वरूप पाठक न सिर्फ लगातार पढ़ता है बल्कि रस निमग्न भी होता है। आइए, हाथ कंगन को आरसी क्या!

 

अवधेश कुमार ‘अवध’

साहित्यकार एवं अभियन्ता

(Mr. Awadhesh Kumar)

Engineer, Plant

Max Cement, GVIL

4th Floor, LB Plaza

GS Road, Bhagavath

Guwahati -781005 (Assam)

awadhesh.gvil@gmail.com

Mob. 9862744237

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