#Samiksha by Avdhesh Kumar Avadh

संस्कार सभ्यता संस्कृति एवं स्वदेशी का सामासिक समन्वय है “वर्णिका”

 

समीक्षक : अवधेश कुमार ‘अवध’

 

 

‘राष्ट्र बगैर / न कोई पहचान / न कोई नाम।’ जब किसी कलम से ऐसे संदेश निकलते हों, अमावस की क्या विसात कि भोर होने से रोक सके! दुश्मन की क्या विसात जो पारावार को टोक सके!! मुसीबतें पहाड़ या दरिया बनकर भी आई हों तो ऐसे जज़्बे से टकराकर लौट जाएँगी। असम की पौराणिक/ऐतिहासिक धरती उषा – अनिरुद्ध के पावन प्रेम , श्रीमन्त शंकर देव की नैतिकता, लाचित बोरफुकन की वीरता, गोपीनाथ बारदोलोई की राष्ट्रभक्ति से आप्लावित है जिससे सिक्त है यहाँ की कवयित्री, अनुवादक, शिक्षिका एवं चित्रकार श्रीमती वाणी बरठाकुर ‘विभा’ की काव्य कृति ‘वर्णिका’ । असमिया और हिन्दी के कई साझा काव्य संग्रहों में रचनाकार व संपादक तथा हिन्दी – असमिया अनुवादक की हैयिसत का लोहा मनवा लेने के बाद ‘वर्णिका’ उनकी पहली स्वतन्त्र काव्य पुस्तक है।

 

मातृभाषा अहिन्दी के परिवेश में पली – बढ़ी कवयित्री की पांडुलिपि जब मुझे मिली तो मैं इस बात से खुश हुआ कि अहिन्दी भाषी प्रदेश में असमिया मातृ भाषी कवयित्री ने हिन्दी का चिराग जलाया। यह आश्चर्यजनित खुशी उत्तरोत्तर बढ़ती गई क्योंकि अतुकान्त कविताओं से गुजरता हुआ मैं तुकान्त, वर्णिक छंद, मात्रिक छंद और फिर मिश्रित छंद  (वर्णिक व मात्रिक) पर जाकर रुका। 120 पृष्ठीय तकरीबन एक सौ कविताओं के इस अप्रतिम संकलन में नौ रस और प्राय: सम्पूर्ण मनोवृत्तियाँ कवयित्री की लेखनी के दायरे में हैं। भक्ति, धर्म, जाति, कर्म, प्रेम, पर्यावरण, भूगोल, खगोल, मौसम, पक्षी, खेल, नेत्रदान, त्यौहार, रूढ़ियाँ, संस्कृति, प्रकृति, राष्ट्र और विशिष्ट व्यक्तियों से परिपूर्ण है ‘वर्णिका’ की विषयवस्तु।

 

पूर्वोत्तर भारत का असम प्रदेश सुरम्य प्रकृति की गोद में बसा है। कवयित्री की जन्मभूमि व कर्मभूमि यहीं है अतएव यहां का सौन्दर्य भाव रोशनाई बनकर शब्दों के अक्स में उभरा – सा दीख पड़ता है। अरुणोदय के संग पक्षियों का कलरव, नन्हें पशुओं की धमा – चौकड़ी, बादलों की गर्जना, बागों का सजना, तिरंगे का गान और ब्रह्मपुत्र नद का नाद कवयित्री को न सिर्फ आकर्षित करते हैं वरन सृजन हेतु आलम्बन व उद्दीपन बनकर भाव प्रवणता उपजाकर विवश भी करते हैं।

 

अतुकान्त विधा की अधिकता के साथ तुकान्त रचनाएँ भी शामिल हैं। वर्णिक छंद के रूप में हाइकू, वर्ण पिरामिड, सायली, क्षणिकाएँ भी अपनी जगह सुनिश्चित करती हैं। मात्रिक छंद में कुछ मुक्तक और दोहे को कवयित्री ने स्थान दिया है । सृजन का श्रृंगार हिन्दी के साथ असमिया और संस्कृत के सुलभ शब्दों ने किया है। उपमा, रूपक, अनुप्रास, अन्योक्ति एवं दृष्टांत अलकार द्रष्टव्य हैं। ‘वर्णिका’ में भावों की प्रधानता प्राय: भक्ति, श्रृंगार, करुण, वीर एवं वात्सल्य की है।

 

‘वर्णिका’ का यह दोहा जिसकी भाव साम्यता कबीर के दोहे से है-

“वन-वन जिसको खोजता,मिला न एको बार।

कस्तूरी मृग हो गया, ‘विभा’ हृदय लाचार ।।”

 

‘प्यासी धरती’ कविता में कवयित्री मानवीय अत्याचार को ही इसका कारण मानती है-

“धरती पर किए

मानवों ने अत्याचार

वृक्ष काटकर

फैक्ट्री बनाकर

पहाड़ काटे

नदी पर लगाए बाँध….

ऐसा परिवेश हो तो

कैसे बरसेगा मेघ।”

 

नेत्रदान की आवश्यकता ही इसकी महत्ता है जिसके प्रति लेखनी सजग होकर आह्वान करती है-

“आओ

तुम और मैं

मिलकर करें

एक संकल्प….

देकर जाएँ

अपनी आँखें,

इन आँखों से

देख सके कोई

रंगीन संसार के

सारे रंग

मन में लिए

असीम उमंग ।”

 

‘सच’ में कवयित्री क्षणभंगुरता के प्रति दार्शनिक हो जाती है-

“अब मुझे मालूम है

दुनिया सच में

गोल है

जहाँ कोई चीज

टिकती नहीं।”

 

‘वर्णिका’ कवयित्री की हिन्दी भाषा में प्रथम मौलिक कृति है इसलिए कमियों/दोषों/त्रुटियों से इंकार नहीं किया जा सकता। आपको क्लेष हो सकता है, आपका कीमती समय कदाचित जाया हो सकता है इसके बावजूद कवयित्री की मंशा है कि हर छोटे दोष के लिए बड़ी से बड़ी सजा दें, किन्तु अपने स्नेह से वंचित न करें।

 

किसी भी पुस्तक का वास्तविक पारखी अन्तत: पाठक ही होता है । श्रीमती वाणी बरठाकुर ‘विभा’ की ‘वर्णिका’ आपके समर्थ हाथों में न्यायिक नज़रों से गुजरते हुए दिल के दरवाजे पर दस्तक दे रही है इस अपेक्षा के साथ कि दिल के किसी कोने में आप जगह जरूर देंगे । ‘वर्णिका’ को उज्जल भविष्य की अनन्त असीम अशेष शुभकामनाएँ।

 

कवयित्री : वाणी बरठाकुर ‘विभा’

प्रकाशन : भारतीय साहित्य प्रतिष्ठान शोणितपुर, असम

मूल्य : रुपये 120 मात्र

 

 

अवधेश कुमार ‘अवध’

कवि, लेखक, समीक्षक व अभियन्ता

 

मैढ़ी, चन्दौली, उत्तर प्रदेश

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