#Samiksha by Kamlesh Srivastava

पुस्तक-समीक्षा : ‘’क्या मुश्किल है’’

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ग़ज़ल आज के दौर की अत्यन्त लोकप्रिय विधा है। दो मिसरों में पूरी बात समेट लेने का हुनर इसी विधा के पास है। इसी लोकप्रियता का परिणाम है, कि आज हर कोई इस विधा में हाथ आज़मा रहा है, वो भी बिना इस विधा के व्याकरण की जानकारी के। परिणामस्वरूप हिन्दी ग़ज़लों के नाम पर ऐसे लेखकों द्वारा जो प्रस्तुत किया जा रहा है, वह अधिकतर कूड़ा- करकट है।

 

लेकिन संजीदा और ग़ज़ल-विधा की पर्याप्त जानकारी रखने वाले ग़ज़लकार कमलेश श्रीवास्तव का ताज़ा गज़ल-संग्रह “क्या मुश्किल है” ग़ज़ल के पाठकों को पूरी तरह आश्वान्वित करता है। संकलन में कुल 125 ग़ज़लें हैं, जो ग़ज़ल की कसौटी पर खरी उतरती हैं। बह्र की अच्छी जानकारी ग़ज़लों का लयात्मकता के रूप में श्रृंगार करती है, जो इस संग्रह में पूरी तरह विद्यमान है। बह्र में होना ही ग़ज़ल की मूलभूत शर्त होती है, जिसे शायर ने बख़ूबी निभाया है। ग़ज़ल की सुव्यवस्थित शिल्प-रचना शायर की भरपूर कामयाबी है। इन ग़ज़लों में मौजूद रवानगी और लयात्मकता इसके प्रमाण हैं।

 

संग्रह की ग़ज़लों की विषयवस्तु में विविधता दर्शनीय है। इनमें ज़िन्दगी के सभी रंगों को समेटा गया है। कुछ ग़ज़लें पाठक को  गुदगुदाती हैं, कुछ सवाल उठाती हैं, कुछ सोचने पर विवश करती हैं। जीवन के अनुभव और संत्रास भी ग़ज़लों में दिखायी देते हैं। भौतिकता की ओर बढ़ता हुआ आज का दौर भी शायर को चिन्तित करता है। अच्छे-बुरे हालात, रिश्तों का निर्वाह, भावनाओं के फूल और काँटे, आम आदमी की पीड़ा- इन सबका ऐसा ताना-बाना बुना गया है, इस संग्रह में, जो पाठक के हृदय में आत्मसात् हो जाते हैं। संग्रह को पढ़कर ऐसा लगता है, जैसे ग़ज़लों को लिखा नहीं, जिया गया है। कुछ ग़ज़लों के अशआर सीधे पाठक के मानस में उतर जाने की सामर्थ्य रखते हैं।

 

प्रेम का एहसास और उसकी मिठास की बानगी के ये अशआर देखिए :-

इन्हें मोती चुगाता हूँ मैं अपनी मुस्कुराहट के

कहीं जाते नहीं आकर तुम्हारी याद के पंछी।

 

शाम को गुज़रा था वो मेरी गली से

रात की तन्हाइयाँ महका रहा है।

 

बिखरे बालों वाली लड़की या अल्ला

मौसम की रूमानी चिट्ठी या अल्ला।

 

वो ख़ुशबू है पहाड़ों की वो दरिया की रवानी है

वो कैसा है ख़ुदा जाने मगर उसमें नशा तो हैं।

 

अबकी बार लिफ़ाफ़ों में यादों के मोती भेजो तुम

दिल की बातें जिसमें हों अब ऐसी चिट्ठी भेजो तुम।

 

मुहब्बत की ऐसी मस्ती का जवाब नहीं :-

ज़रूरी है कि उन आँखों के प्याले भी छलकते हों

अकेली मय से तो हमको नशा यूं भी नहीं होता।

 

दार्शनिकता और सूफ़ियाना अन्दाज़ लिए हुए ये अशआर :-

चाहे किस्से पूरे हो जायें जीवन के

लेकिन कुछ क़िरदार अधूरे रह जाते हैं। ……. ये जीवन का सच है।

 

जिसकी इक ठोकर ने मुझको रस्ता दिखलाया

दुश्मन हो चाहे वो पत्थर अच्छा लगता है।

 

पहले हममें प्यार बहुत था लड़ते भी थे कभी-कभी

अब रिश्ते में गाँठ पड़ी है अब वो झगड़ा नहीं रहा।

 

इक रोज़ सिमट जायेगी लहरों के बदन में

क्या बूँद की हस्ती है समंदर के सामने।

 

शायर ने ज़िन्दगी को जैसा जिया, बिना किसी लाग-लपेट के उसे बयाँ कर दिया :-

मैं चढ़ता गया उम्र की पायदानें

नशा ज़िन्दगी का उतरता गया है।

 

फिर किसी बच्चे की तरहा मुस्कुराई ज़िन्दगी

मौत से मिलकर दुबारा लौट आई ज़िन्दगी।

 

ज़िन्दगी को लोग क्यों विष की तरह पीते

गर न होतीं बंदिशें अमृत के पीने पर।

 

ज़हरीले नागों का जमघट लगने लगता है मन में

सारे कड़वे सच होठों पर आ जाते हैं पीते ही।

 

जिसमें ख़ुद्दारी न हो, वह शायर कैसा….. देखें ये अशआर :-

मैं भी अपनी कड़वाहट को पी लूँगा

जब भी तुम आ जाओगे मीठे होकर।

 

मुझे कोई बंदिश गवारा नहीं है

मैं रस्मों की ज़ंजीर तोड़ूँगा फिर से।

 

ये है शायर की ज़िन्दादिली :-

साहिल पर मेरे मरने की ख़बरें उड़ती हैं

पर मैं अब भी दरिया के सीने में ज़िन्दा हूँ।

 

सबके आँसू रोते देखे

अपने तो हँसते हैं आँसू।

 

मुसीबत के लम्हों में ढाढ़स बँधाता हुआ ये शेर :-

मुश्किलों के दौर से बाहर चले आओ

थक गये होगे चलो अब घर चले आओ।

 

कवि-शायर आशावादी होता है, सकारात्मक होता है। आशावादिता ही जीवन का प्राण-तत्व है, जिसे ग़ज़लकार ने बख़ूबी उकेरा है :-

वक़्त का सूरज तपा मुझ पर हमेशा

प्यार का दरिया हूँ मैं सूखा नहीं हूँ।

 

बस पौधों को पानी देते रहना तुम

हम जाकर लौटेंगे फिर इन फूलों में।

 

तिश्नगी अपने लबों पर ले के जाते हो कहाँ

ज़िन्दगी के मयकदे में जाम बाक़ी हैं बहुत।

 

आज की मक्कारी भरी सियासत को भी ग़ज़लकार ने आड़े हाथों लिया है :-

सीख ले थोड़ी अदावत और कुछ मक्कारियाँ

सीख ले तू भी सियासत का जादू औ चल।

 

शेरों की गिनती सरकारों ने कर ली

हम पंछी बंजारे गिन कर देखेंगे।

 

अच्छा है ख़ामोश रहें या कम बोलें

कुछ बातें खुल कर कहने में ख़तरा है।

 

आज का युग भौतिकवाद का युग है। यह शायर की सबसे बड़ी चिन्ता है :-

मैं बरसों बाद लौटा आज अपने गाँव अपने घर

यहाँ देखा कि सब कुछ है मगर सारे परेशां हैं।

 

शायर ने आज के ख़ुदगर्ज़ और मक्कार आदमी की पहचान कुछ इस तरह की है :-

पल में तोला पल में माशा लगते हो

चेहरे पर कितनी परतें हैं जाने दो।

 

भावुकतापूर्ण ये शेर किसी की भी आँखों को नम कर सकता है :-

हमने फूलों की डोली में बैठा कर भेजा उसको

बेटी ने अपने घर जाकर रस्मों के पत्थर ढोये।

 

आज के दौर में आदमी की बेबसी को ख़ूब चित्रित किया गया है :-

मुस्कुराने का चलन है आज कल

अपनी तक़लीफ़ें उजागर क्या करें।

 

हो गये तारे इकट्ठे रोशनी के जश्न में

मैं गगन का चाँद हूँ मैं फिर अकेला रह गया।

 

होठ थे प्यासे, जुबां थी ख़ुश्क, मीलों रेत थी

और मैं करता भी क्या आँखों को गीला कर लिया।

 

मुश्किलों के दौर से बाहर चले आओ

थक गये होगे चलो अब घर चले आओ।

 

और, ये है ग़ज़ल की रूह को परिभाषित करता हुआ शेर :-

जब से रूख़सत हुई है ग़ज़ल रूह की

सिर्फ़ अल्फ़ाज़ हैं शायरी जा चुकी।

 

अच्छा साहित्य पढ़नेवालों के लिए एक अच्छी पुस्तक है ये। हालाँकि, ग़ज़ल की बारीक़ियों के जानकारों को इसमें कहीं-कहीं कुछ दोष मिल सकते हैं, यथा- ऐबे-तनाफ़ुर (स्वरदोष- मिसरे में किसी शब्द के अंतिम अक्षर की उसके बाद वाले शब्द के पहले अक्षर से समानता, जैसे- उन नयनों), तक़ाबुले रदीफ़ (मतले के अलावा किसी शे’र के दोनों मिसरों का अन्त समान स्वर पर होना), ऐबे-तख़ालुफ़ (शे’र को वज़्न में रखने के लिए किसी शब्द छेड़छाड़ करना जैसे – उम्र को उमर या फ़िक्र को फ़िकर लिखना), ऐबे-शुतुरगुरबा (वचन सम्बन्धी दोष- एक ही शे’र में किसी को दो संबोधन जैसे- ’तू’ और ’तुम’। किसी भी हालत में इससे बचना चाहिए।)

 

पुस्तक का मुद्रण एवं गेट अप उच्च कोटि का है। कवर पृष्ठ आकर्षक है। प्रूफ़ एवं व्याकरण सम्बन्धी त्रुटियाँ नगण्य हैं।

 

कुल मिलाकर आधुनिक युग-बोध का प्रतिनिधित्व करता हुआ कमलेश श्रीवास्तव का ‘‘क्या मुश्किल है‘‘ ग़ज़ल-संग्रह पठनीय, सराहनीय एवं संग्रहणीय है। ग़ज़लकार को बहुत-बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं।

अजीत शर्मा ‘ आकाश ‘ , इलाहाबाद उ.प्र.

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पुस्तकः क्या मुश्किल है (ग़ज़ल संग्रह)

ग़ज़लकारः कमलेश श्रीवास्तव

प्रकाशकः ‘धवल श्री‘ प्रकाशन, धवल निधि, बालाजी नगर,

पचौर (ज़िला-राजगढ़) म0प्र0-465683

मूल्यः रू0 200/- रूपये (सजिल्द़)

पृष्ठ संख्या- 128

 

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