#Sansmaran by Dr Abha Mathur

बड़ी अम्मा(संस्मरण)++
बात बहुत वर्ष पुरानी है।मैंनेजब उस नगर के महाविद्यालय में प्रवक्ता पद का कार्यभार ग्रहण किया तब पहली समस्या जो सामने आई वह आवास की थी।कुछ समय के लिये एक पारिवारिक मित्र के यहाँ ठहर गई थी परन्तु आवास की व्यवस्था तो करनी ही थी, पारिवारिक मित्र के घर सदा तो रहा नहीं जा सकता था ।कॉलेज में प्रथम परिचय आशा दीदी से ही हुआ।संयोग से वह भी उसी नगर की थीं जहाँ मेरे बड़े भाई कार्यरत थे और उनके साथ ही मेरे माता-पिता भी रहते थे। अपने शहर की जान कर आशा दीदी ने बड़े स्नेह पूर्वक मुझे अपनी मित्र बना लिया था या
कहिये कि मुझे अपने संरक्षण में ले लिया था ।वे उस महाविद्यालय में दो वर्ष सेवा कर चुकी थीं और उस नगर को जानती भी थीं। वे भी मेरी ही तरह उस नगर में अपने माता-पिता से दूर कमरा ले कर रहती थीं और मेरी ही तरह
अविवाहित थीं,यद्यपि आयु में मुझसे 4-5 वर्ष बड़ी थीं।
आशा दीदी ने मेरे आवास की समस्या चुटकियों में हल कर दी । ” मेरे घर से सटा हुआ जो घर है, उसका ऊपर का कमरा ख़ाली है और गृहस्वामी उसे किराये पर देना भी चाहते हैं।यद्यपि दोनों घरों के प्रवेश द्वार अलग अलग सड़कों पर हैं पर दोनों की छतें आपस में मिली हुई हैं। मेरे पास भी ऊपर का कमरा ही है। एक तरह से तुम मेरे पास ही रहोगी “, उन्होने कहा । इस प्रकार मैं उनकी प्रतिवेशिनी बन गई। हम दोनों एक साथ महाविद्यालय जाते और लौटते भी प्राय: एक साथ ही। कमरे अलग अलग होने पर भी, कॉलेज के
अतिरिक्त मेरा अधिकांश समय आशा दीदी के साथ ही व्यतीत होता था।कभी तो मैं उनके घर ही चाय पी लेती थी, और कभी चाय का एक कप अपनी छत से ही उन्हे पकड़ा कर, दूसरा कप हाथ में ले कर, छत के रास्ते उनके कमरे में चली जाती थी ।
आशा दीदी जिस मकान में किराये पर रहती थीं,वह मकान और उसके आस पास के सभी मकान एक ही वंश के लोगों के थे।मेरा उस परिवार के साथ उठना बैठना अधिक होता था अतः मैं इन बातों से परिचित होती चली गई।आस पास के आठ दस घरों का वंश-वृक्ष एक ही था जो पीढ़ी दर पीढ़ी विभाजित होते-होते अलग -अलग परिवारों में परिवर्तित हो गया था।उस घर में प्रायः एक वृद्धा , या कहिये अति वृद्धा, आती जाती दिखती थीं। उनकी आयु नव्वे वर्ष से कम न होगी ।शक्ल सूरत और वस्त्रों से वह अत्यन्त दीन-हीन दिखती थीं। प्रारम्भ में तो मैं उन्हे कोई सेविका या किसी सेवक की रिश्तेदार समझती थी ।बाद में ज्ञात हुआ कि वह उस वंश वृक्ष की सबसे वरिष्ठ सदस्या थीं ।
सब लोग उन्हे “बड़ी अम्मा” कहते थे। उस समय उनका खाना पीना और रहना जिस परिवार के साथ था, उस परिवार का मुखिया और कई जवान पोते पोतियों का दादा और कई अधेड़ पुत्र- पुत्रियों का पिता वह वृद्ध , उन बड़ी अम्मा का पोता था।मुझे यह जान कर बड़ा आश्चर्य हुआ कि इतने सम्पन्न
परिवार की सदस्या ,बड़ी अम्मा ,इतनी दीन हीन दशा में रहती हैं।बाद में धीरे धीरे पता चलता गया कि बड़ी अम्मा की दीन हीन दशा के कई कारण थे।पहला कारण तो था उनकी आयु जिसके चलते उन्हे ढंग से पहनने ओढ़ने की नतो इच्छा थी ,न होश हवास था।दूसरा कारण यह था कि एक सपने में अपनी मृत्यु निकट देख कर उन्होंने अपने सब आभूषणों का बँटवारा कर दिया था ,शायद धन का भी, और अब उनके पास कुछ न था ।तीसरा और सबसे प्रमुख कारण यह था कि उनके पति या बेटे – बेटियों में से तो कोई जीवित था नहीं।जो पोता उस समय परिवार का मुखिया था, वह बड़ी अम्मा से अत्यन्त घृणा करता था क्योंकि उसने अपने बचपन में बड़ी अम्मा
को अपनी माँ पर ( जो बड़ी अम्मा की बहू थी ) अत्याचार करते देखा था ।मुझे यह जान कर
बहुत आश्चर्य हुआ कि दीन हीन सी दिखने वाली बड़ी अम्मा सास के रूप में बड़ी ही कठोर शासिका थीं और अपनी बहुओं को बहुत दबा कर रखती थीं।कहा जाता था कि वे “हिटलर” थीं। संयुक्त परिवार की सभी बहुओं में दूध का बँटवारा वे सवेरे ही कर देती थीं। उसके बाद किसी बहू के हिस्से का दूध यदि फट जाता या
उफन कर बह जाता तो उसे और दूध नहीं मिलता था , भले ही उसके बच्चे भूखे रहें ,या पति व अन्य सदस्य बिना चाय के रहें।यह भी कहा जाता था कि किसी शादी वगैरह में जाते समय यदि किसी बहू की साड़ी उन्हे पसन्द नहीं आती थी तो उस बहू को उसी समय साड़ी बदलनी पड़ती थी।
जिस समय मेरा उनसे एकतरफ़ा परिचय हुआ था, अर्थात मैं तो उन्हें जानती थी परन्तु वे मुझे नहीं जानती थीं,उस समय परिवार में उनकी बड़ी दुर्दशा थी। कहा जाता था कि बड़ी अम्मा का पेट कभी नहीं भरता ,इसी लिये वे हर समय खाने को माँगती रहती हैं। हो सकता है उन्हे भरपेट खाना न दिया जाता हो या यह भी हो सकता है कि उनकी जिह्वा लोलुपता उन्हे माँगने को प्रेरित करती हो। मुझे देखते ही वह कहतीं ,” दे दे बेटी , पुड़िया दे दे।”
शायद उन्हे जो कुछ दिया जाता था वह बर्तनों में नहीं ,कागज़ में दिया जाता था। कभी कभी मैं उन्हें मूँगफली या गज़क जैसी कोई चीज़ देती भी थी ,परन्तु वे हर समय माँगती रहती थीं । अन्य परिवारों (उसी वंश के) के सदस्य यह भी कहते थे कि बड़ी अम्मा को खाना तिमंज़िले से नीचे फेंक कर दिया जाता था।यह बात सच हो भी सकती थी क्योंकि वह परिवार तिमंज़िले मकान में रहता था और बड़ी अम्मा प्रायः नीचे के तल्ले पर और शेष परिवार ऊपर की दोनों मंज़िलों पर रहता था ।यह भी हो सकता था कि यह बात मनगढ़ंत हो।
एक बार की बात है, आशा दीदी के मकान मालिक के परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठे थे । संयोगवश मैं भी उस समय वहीं बैठी थी ।बड़ी अम्मा भी वहीं बैठी थीं। वे मुसे पूछने लगीं ” लल्ली री ,तू किस क्लास में पढ़ै है ? ” मैंने उत्तर दिया,”बड़ी
अम्मा मैं पढ़ती नहीं हूँ , पढ़ाती हूँ।” आशीर्वाद मिला ,” अच्छा , अच्छा , बेटी ,ख़ुश रहो ।” पाँच मिनट बाद पुनः वही प्रश्न किया गया । मैंने पुनः वही उत्तर दिया। यह क्रम तीन चार बार दोहराया गया।आजकल के बच्चे होते तो दूसरी बार में ही झुँझला जाते पर मेरे मन में उनके प्रति विराजित करुणा ने , झुँझलाने का अवसर ही नहीं दिया ,उलटे वह करुणा और गहरी हो गई।वृद्धावस्था भी क्या चीज़ है!स्मृति लोप कर के मनुष्य को हास्यास्पद बना देती है। उस समय उस परिवार की तीन चार बहुएं वहाँ बैठी थीं जो बी.ए , एम.ए. में पढ़ने वाले बच्चों की माएं थीं ।चाय आई ।सभी को दी गई, मुझे भी दी गई परन्तु बड़ी अम्मा को एक कप चाय देना उचित नहीं समझा गया। इसके बाद जब उन अधेड़ बहुओं की वृद्धा सास वहाँ आईं तो उन्होंने सबसे पहले बड़ी अम्मा के पैर छुए, उसके बाद उन अधेड़ बहुओं ने वृद्धा सास के पैर छुए ।तब मेरी आयु 21 वर्ष की थी ।दुनिया का अधिक ज्ञान न होने पर भी मेरा मन विगलित हो गया।कितनी आसानी से उन लोगों ने सर्वाधिक
आदरणीय को तिरस्कृत बना रखा था ! भला एक कप चाय से उस सम्पन्न परिवार को क्या अन्तर पड़ना था ! पर जहाँ वास्तविक प्रेम और औपचारिकता दोनों नदारद हों वहाँ एक कप चाय भी क्यों ख़र्च की जाये ? वे बेचारी लगातार मुझसे ” पी ले बेटा ,पी ले” कहती रहीं और मेरा दिल
आठ आठ आँसू रोता रहा।मेरा इतना अधिकार तो न था कि सब घर वालों के न देने पर भी मैं उन्हे
चाय का कप दे सकती । आज का समय हो तो मैं ऐसी परिस्थिति में अपना कप उन्हें दे दूँ
पर उस समय इतनी हिम्मत नहीं कर सकी, शायद कम आयु और अनुभवहीनता के कारण।
बड़ी अम्मा के विषय में अनेक कहानियाँ उन परिवारों में
(.जो वस्तुत: एक ही वंश के थे )प्रचलित थीं। उनमें से एक कहानी या सत्य घटना यह थी कि एक बार बड़ी अम्मा और उनका पोता व पोत-बहू आँगन में सो रहे थे। सब के मुख चादरों से ढके थे।बड़ी अम्मा की चारपाई पोते-पोतबहू की चारपाई से कुछ हट कर थी। तभी घर में चोर आये और पास पास पड़ी दो चारपाइयों को स्त्रियों की चारपाइयाँ व दूर पड़ी चारपाई को मर्द की चारपाई
समझ कर ( जिस पर बड़ी अम्मा सो रही थीं ) ख़ूब डन्डे बरसाये ,जिससे वे अर्द्धमृत सी हो गईं । हर समय दुर्दशा और अपमान झेलने वाली बड़ी अम्मा के दिल में बसी ममता का अनुमान एक घटना से लगाया जा सकता है। परिवार की एक विवाहिता पुत्री प्रसव के लिये मायके आई हुई थी । वह ज़िला चिकित्सालय में भर्ती थी । बार बार कहने पर भी जब कोई उन्हें अस्पताल नहीं ले गया तो बड़ी अम्मा अकेली ही पैदल तीन चार मील दूर स्थित अस्पताल पहुँच गईं ।
बड़ी अम्मा की वह करुण सी सूरत, उनका वह काँपती सी आवाज़ में ” दे दे बेटी , पुड़िया दे दे ” कहना, मेरे हृदय पर आज भी अंकित है।आज जब हम वृद्धाश्रम में रहने वाले वृद्ध वृद्धाओं की सन्तानों पर लानत भेजते हैं, तब मेरे मन में आता है कि योग्य और नालायक़ दोनों तरह की सन्तानें तो तब भी होती
थीं और आज भी होती हैं।उस समय में भारत में वृद्धाश्रम नहीं होते थे अन्यथा जैसा जीवन बड़ी अम्मा जी रही थीं, वृद्धाश्रम का जीवन क्या उस से बुरा होता होगा ?
डॉ.आभा माथुर

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