#Sansmaran by Mukesh Kumar Rishi Verma

संस्मरण – जनरल डिब्बे का सफर

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हिंदी फीचर फिल्म – शूद्र अ लव स्टोरी में मेरी छोटी सी भूमिका पूर्ण हो चुकी थी | दोपहर को पैकअप हो गया और उसी दिन मैं बनारस जंक्शन पहुंच गया | यह बात उसी दिन की है जिस दिन बनारस में कैंट पुल हादसा हुआ था… | बनारस से आगरा तक का सफ़र जनरल डिब्बे में करना था | मेरी किस्मत अच्छी रही कि बनारस से लखनऊ तक डिब्बा (बोगी) खाली था और मैं बडे आराम से सोता हुआ लखनऊ रात के करीब 11 बजे पहुंच गया | यहाँ से मुझे ट्रेन बदलनी थी | यहाँ भी किस्मत ने साथ दिया प्लेटफार्म नं. 4 पर आगरा जाने वाली ट्रेन तैयार खडी मिली | ट्रेन की जनरल बोगियों को देख मेरा दम फूल गया | लोग भेड-बकरियों की तरह भरे हुए थे | कुछ लोग तो कम्बल बांधकर मधुमक्खी के छत्तों की तरह लटक रहे थे | और तो और शौचालय तक में पैर रखने की जगह नहीं थी |

 

परन्तु मुझे तो सफर करना ही था | सोचा कि अगर प्लेटफ़ॉर्म पर दूसरी ट्रेन का इन्तजार करूंगा तो यहाँ भी खड़ा होना है तो फिर क्यों न इसी ट्रेन में खड़े – खड़े सफर किया जाये | कानपुर से ट्रेन बदल ली जायेगी | आखिर उसी ट्रेन में ढेलते-पेलते चढ़ गया | रेलगाड़ी ने रफ्तार पकड़ी तो लोग हिले-डुले और सांस लेने की जगह मिल गई | आधी रात का समय था लोग झपकियां ले रहे थे | सिर्फ मैं और एक अधबूढा जोडा जाग रहे थे | मैं तो दिन में अपनी नींद पूरी कर चुका था पर अधबूडों को प्रेम रोग लगा था सो उन्हें नींद कहाँ… उनके क्रिया कलापों से आधुनिक प्रेमी भी सरमा जायें, खैर मुझे क्या…?

 

ट्रेन अब कानपुर सैंट्रल पहुंच चुकी थी | यहाँ मुझे उतरना था पर उतरा नहीं… सोचा चलो स्टेशन पर झक मारने से अच्छा है | इसी ट्रेन में माथा फोड़ा जाये, आखिर पहुंचायेगी तो आगरा ही और फिर मेरा सफर भी तो आगरा तक का ही है |  कुछ लोग जाग चुके थे | एक महाशय से बात शुरू हुई तो महोदय टूण्डला के निकले | कुछ देर बात करने पर पता चला सरजी रंग-रसिया हैं | उन्हींने शुरू की उन अधबूडों की प्रेम कहानी, क्योंकि उनका रोमांस अभी भी बरकरार चल रहा था | रंग-रसिया जी बोले – ससुर के नाती कल्लि संजा ते ऐसे हीं चूमा-चाटी करि रहै हैं | जिन्हें नेकू शरम ना हती, कम से कम अपनी उम्र को तो खयाल करें | एैसें सार्वजनिक प्रेम – प्रदर्शन ठीक ना रहतु, घर पे मज्जें | जिअ जनी जा हरामी की औरत ना है | जरूर भजाईकैं लाओ होगो |

 

मैं भी उस रंग-रसिया की हां में हां मिलाता रहा, मुझे वक्त जो गुजारना था | ट्रेन की उमस भरी गर्मी और तंग जगह में रंग-रसिया ने खूब मनोरंजन किया |

 

अब सुबह हो चुकी थी, ट्रेन टूण्डला पहुंचने वाली थी | रंग – रसिया ने अपने बैग से चाइनीज़ भोंपू निकाला और भक्ति गीत बजाने शुरू कर दिये | शायद ट्रेन में जो पाप किये थे, उन्हें खत्म कर रहा था | टूण्डला आ गया… महाशय हाथ मिलाकर चले गए | अधबूढों का प्रेम सीन खत्म हो चुका था | हिंगने-मूतने वालों की लाईन लग चुकी थी | गरम चाय, गरम समोसा वालों ने रैंकना शुरू कर दिया था |

 

कुछ समय बाद ट्रेन हिली और चल पड़ी… लोग आपस में बतिया रहे थे | मैं भी बतिया ते बतिया ते उन अधबूढों के पास पहुंच गया | बातों ही बातों में पता चला कि वे असम के हैं | और नई दिल्ली में मजदूरी करते हैं | पर मैं उस औरत का पता लगाने में नाकाम रहा | वो उसकी पत्नी थी या प्रेमिका… दरअसल उनकी भाषा मुझे पल्ले नहीं पडी थी | खैर किसी तरह मेरा सफर पूरा हो चुका था | हमारे देश के प्रधानमंत्री माननीय नरेन्द्र मोदी जी हमारे लिए बुलेटट्रेन लाने वाले हैं | पर हमें बुलेटट्रेन की जरूरत नहीं… इसी भारतीय रेल में सामान्य बोगियों को बढा दें, यही काफी है | अगर उन्हें नहीं लगता तो एक बार मेहरबानी करके जनरल डिब्बे में आम भारतीय बनकर सफर करें | कसम से दुनिया की सैर करना भूल जाएंगे | खैैर छोडिये वो हमारे प्रधानमंत्री थोडे ही है, वो तो इंडिया वालों के हैं और हम हैं ठेट भारतीय… | आगरा फोर्ट आ चुका था, मैं उतर गया… घर जाने के लिए !

 

 

– मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

ग्राम रिहावली, पो. तारौली गुर्जर,

फतेहाबाद, आगरा, 283111

 

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