#Sansmaran by Rajesh Gupta Badal

विधा              – संस्मरण

 

बात उन दिनों की है जब मैं सायद हायर सेकंडरी कर रहा था और कुछ तुक बंदियां लिखता रहता था और पिता जी को सुनाया करता वो अच्छा है कह देते तो मैं अपने मित्रों को पकड़ पकड़ कर उनका दिमाग़ चाटा करता था उन्हीं दिनों मेरे कस्बे में एक अखिल भारतीय कवि सम्मेलन का आयोजन हुआ जिसमें सांड नरसिंहपुरी ,इंदिरा इंदू ,अनिल भारद्वाज,हरिओम पंवार जैसे श्रेष्ठ कवियों का आना हुआ

अब जब मंच संचालन हुआ तो जिन दोस्तों को मैं खाता रहता था उन्होंने मुझे बिना बताते मंच पर बुला लिया अब मैं चला तो गया मित्रों परन्तु मेरे हाथ पैर है कांप रहे थे जैसे फांसी पर चढ़ा दिया गया हो कुछ लोग चिल्लाने लगे कुछ तालियां बजाने लगे जैसे तैसे कुछ तुकबंदियां सुनाई डर था कि कम होने का नाम नहीं ले रहा था मगर उस दिन  फिर जो उन काव्य के महारथियों का लाड़ प्यार मिला उसे आज तक नहीं भुला पाया उस दिन के उन सभी की हस्थलिखत पंक्तियां  न आज तक भी मेरे पास सुरक्षित रखी हैं और इसका यह भी फायदा हुआ कि जब तक मैं अपने कस्बे में रहा नियमित मासिक काव्य गोष्ठी में जाता रहा और आदरणीय आदित्य शिवपुरी द्वारा मुझे ‘बादल’ नाम मिला।

 

मैं आज भी उन दिनों को याद करता हूं किस तरह बिना किसी साधन के मात्र फर्स विछा कर काव्य गोष्ठी हुआ करती थीं और जब पहली बार मेरी पंक्तियां …

 

” कलम जबसे जैबों में जाके सजने लगी है,

कागज़ हैं कि बेचारे मिलन को तरह गये। ”

 

अखबार की में कार्यक्रम की मुख्य लाइन बनी  वो खुशी आज मंच से कार्य पाठ करने पर भी महसूस नहीं होती।

 

राजेश गुप्ता’बादल’

मुरैना म. प्र.

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