#Sazal by Gayaprasad Mourya , Rajat

सजल

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अपना ही ये चेहरा अक़सर डराता है मुझे .

अपना ही अब पराया  नज़र आता है मुझे .

मैं हांथों में बुत बन के रह गया हूँ उसके ,

हर रोज़ मिटाता है खुद ही बनाता है मुझे .

मिटटी है वतन की कसम नही खा सकता,

दगा दे सकता वो ऐसा नज़र आता है मुझे .

अपनी महफ़िल से  रुसवा कर दिया तुमने ,

गैरों की बस्ती में देखूं कौन बिठाता है मुझे .

तुम्ही ने कह था आगे बढ़ो साथ में हम भी हैं ,

फकत हूँ फकीरी  में देखूं कौन निभाता है मुझे .

रजत गिरा है यों हरशू संभलने की कोशिश में ,

फलक से गिर गया हूँ देखूं कौन उठाता है मुझे .

‘रजत ‘ आगरा

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