#Shayari by Akash Khangar

कसूर किसका है कौन जानता है

सही और गलत खुदा जानता है

कैसा अजीब खेल है न दिलो का

तुम उसे कुछ भी नहीं मानते

जो तुम्हे खुदा मानता है…

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बड़ी नाजुक थी प्रेम की कंठिया(मालाएँ)

एक गाठ आई बीच में

और सब कुछ बिखेर गयी…

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न जाओ के बहुत पछताओगे तुम

यादो से भी ज्यादा याद आओगे तुम

तुम न मिलोगे दोबारा मालूम है मुझे

फिर भी लौट आना इंतज़ार रहेगा तुम्हारा

जहा छोड़ जा रहे हो वही मुझे पाओगे तुम

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