#Shayari by Karan Sahar

मैं हर वक्त किसी ग़ज़ल में रहता हूँ,
बेमौसम ही कटी फसल में रहता हूँ ।

जहाँ छतें तो हैं मगर दीवारें नहीं हैं,
मैं तो कुछ ऐसे ही महल में रहता हूँ ।

तुम जिन ज़ख्मों से फाँसले रखते हो,
मैं उन्हीं ज़ख्मों के बगल में रहता हूँ।

#करन_सहर

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