#Shayari by Sandeep Yadav

शान ऐ शौकत की खातिर हर रोज कमाना पड़ता है,

घर में श्री मती का सारा भार उठाना पड़ता है,,

अक्सर बाहर दादागीरी करने वाले लोगो को,

घर के अंदर महबूबा के पैर दबाना पड़ता है,,

 

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रोजी रोटी की खातिर हर रोज कमाना पड़ता है,

महबूबा के खर्चो का भी भार उठाना पड़ता है,,

अक्सर बाहर दादागीरी करने वाले लोगो को,

घर में अपनी श्रीमती के पैर दबाना पड़ता है,,

हास्य कवि संदीप यादव

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