tevri by ramesh raj

या तौ बरसै प्रेम-घन या ऐसे गरजै न
हम चकोर-से, मोर-से, नैन रहें बेचैन। समस्या का कुछ हल हो।।

सुख बीते, रीते हुए सभी नेह के गेह
किमकर्तव्यविमूढ़ हम, राग-विराग सुझै न। समस्या का कुछ हल हो।।

उधर  सियासत की मुखर ऊधौ  वही कुनीति
इधर  प्रीति की रीति की वास-सुवास छुपै न। समस्या का कुछ हल हो।।

दें पैगाम न श्याम यों नदी-सदी हो रेत
हरा-भरा मंजर, शजर मरुथल में बदलै न। समस्या का कुछ हल हो।।

बिटिया अगर गरीब की, क्या उसका सम्मान
ज़िन्दा वह ससुराल में ऊधौ  रहै, रहै न। समस्या का कुछ हल हो।।
+रमेशराज

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