#Tewari by Ramesh Raj

तेवरी —

प्यार की भरती न गागर लग रहा

जल नहीं अब एक छल में बोलता घर लग रहा।

कह रहा क्यूँ कर ‘लहर मुझसे बने’

वह समन्दर-सा न अन्दर और बाहर लग रहा।

हम लचीले बाँस जैसे क्या बने

मिल गया मंतर हमें सुन आज मन तर लग रहा।

कुछ मुँडेरों को गिरा हम खुश हुए

बोझ हल्का क्या किया घर और दुल्लर लग रहा।

पाप को-संताप को जो है असह

आग उगलेगा, करेगा राख शंकर लग रहा।

[ रमेशराज ]

 

 

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